पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 4.djvu/१४७

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आई थी और कहती थी कि उसके अन्दर तीन कोठरियाँ हैं, एक पायखाना है और दो कोठरियां खाली पड़ी हैं। अन्ना को शक हुआ कि उसी कोठरी के अन्दर से आवाज आई है। उसने सोचा कि शायद दारोगा का कोई आदमी यहाँ आकर उस कोठरी में गया हो। थोड़ी देर तक तो वह उसके अन्दर से किसी के निकलने की राह देखती रही, मगर इसके बाद उठ खड़ी हुई। अन्ना थी तो औरत मगर उसका दिल बड़ा ही मजबूत था, वह मौत से भी जल्दी डरने वाली न थी। उसने हाथ में चिराग उठा लिया और उस कोठरी के अन्दर गई। पैर रखने के साथ ही उसकी निगाह एक गठरी पर पड़ी, मगर इधर-उधर देखा तो कोई आदमी नजर न आया। दूसरी कोठरी के अन्दर गई और तीसरी कोठरी में भी झांक के देखा, मगर कोई आदमी नजर न आया, तब उसने चिराग एक किनारे रख दिया और उस गठरी को खोला। इतने ही में मेरी आँख खुल गई और घर में अँधेरा देखकर मुझे डर मालूम हुआ। मैंने हाथ-पैर फैलाकर अन्ना को उठाना चाहा, मगर वह तो वहाँ थी ही नहीं। मैं घबराकर उठ बैठी। यकायक उस कोठरी की तरफ मेरी निगाह गई और उसके भीतर चिराग की रोशनी दिखाई दी। मैं घबराकर जोर-जोर से 'अन्ना-अन्ना' पुकारने लगी। मेरी आवाज सुनते ही वह चिराग और गठरी लिए बाहर निकल आई और बोली "ले बेटी, मैं तुझे एक खुशखबरी सुनाती हूँ।"

अन्ना ने यह कहकर गठरी मेरे आगे रख दी कि 'देख, इसमें क्या है !' मैंने बड़े शौक से वह गठरी खोली, मगर उसमें अपनी प्यारी माँ के कपड़े देखकर मुझे रुलाई आ . गई। ये वे ही कपड़े थे जो मेरी माँ पहनकर घर से निकली जब उन दोनों ऐयारों ने उसे गिरफ्तार कर लिया था और ये ही कपड़े पहने हुए कैदखाने में मेरे साथ जब दुश्मनों ने जबर्दस्ती उसे मुझसे जुदा किया था। उन कपड़ों पर खून के छींटे पड़े हुए थे और उन्हीं छींटों को देखकर मुझे रुलाई आ गई। अन्ना ने कहा, "तू रोती क्यों है, मैं कह जो चुकी कि तेरे लिए खुशखबरी लाई हूँ, इन कपड़ों को मत देख, बल्कि इनमें एक चिट्ठी तेरी माँ के हाथ की लिखी हुई है उसे देख !" मैंने उन कपड़ों को अच्छी तरह खोला और उनके अन्दर से वह चिट्ठी निकाली। मालूम होता है जब मैं 'अन्ना-अन्ना' कह के चिल्लाई तब वह जल्दी में उन सभी को लपेटकर बाहर निकल आई थी। खैर, जो हो, मगर वह चिट्ठी अन्ना पढ़ चुकी थी क्योंकि वह पढ़ी-लिखी थी। मैं बहुत कम पढ़-लिख सकती थी, केवल नाम लिखना भर जानती थी, मगर अपनी माँ के अक्षर अच्छी तरह पहचानती थी, क्योंकि वही मुझे पढ़ना-लिखना सिखाती थी। अतः चिट्ठी खोलकर मैंने अन्ना को पढ़ने को कहा और अन्ना ने पढ़ कर मुझे सुनाया। उसमें यह लिखा हुआ था--

"मेरी प्यारी बेटी इन्दिरा,

जितना मैं तुझे प्यार करती थी निःसन्देह तू भी मुझे उतना ही चाहती थी, मगर अफसोस, विधाता ने हम दोनों को जुदा कर दिया और मुझे तेरी भोली सूरत देखने के लिए तरसना पड़ा। परन्तु कोई चिन्ता नहीं, यद्यपि मेरी तरह तू भी दुःख भोग रही है मगर तू चाहेगी तो मैं कैद से छूट जाऊंगी और साथ ही इसके तू भी कैदखाने से बाहर