पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 3.djvu/७३

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पढ़ना आरम्भ करता हूँ, परन्तु इसमें बहुत से शब्द ऐसे हैं जिनका मतलब समझ में नहीं आता...

इन्द्रजीतसिंह-ठीक है, मगर मैं अभी कह चुका हूँ कि तुम्हें खोजता हुआ जब मैं खूटियों वाले मकान के पास पहुँचा तो राजा गोपाल सिंह ने...

आनन्दसिंह-(बात काट कर) जी हाँ, मुझे बखूबी याद है, आपने कहा था कि राजा गोपालसिंह ने कोई ऐसी तरकीब आपको बताई है कि जिससे केवल रिक्तगंथ ही नहीं बल्कि हर एक तिलिस्मी किताब को पढ़कर उसका मतलब आप बखूबी समझ सकेंगे, अस्तु, मेरे कहने का मतलब यह था कि जब तक आप वह मुझे न बताएँगे तब तक...

इन्द्रजीतसिंह- (हँस कर) इतनी उलझन डालने की क्या जरूरत थी! मैं तो स्वयं ही वह भेद तुमसे कहने को तैयार हूँ, अच्छा सुनो।

कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी किताबों को पढ़ कर समझने का भेद जो राजा गोपालसिंह से सुना था, आनन्दसिंह को बताया। इतने ही में मन्दिर के पीछे की तरफ चिल्लाने की आवाज आई, तो दोनों भाइयों का ध्यान एकदम उस तरफ चला गया और और तब यह आवाज सुनाई पड़ी, "अच्छा-अच्छा, तू मेरा सिर काट ले। मैं भी यही चाहती हूं कि अपनी जिन्दगी में इन्द्रजीत सिंह और आनन्दसिंह को दुःखी न देखूँ। हाय इन्द्रजीतसिंह, अफसोस, इस समय तुम्हें मेरी कुछ भी खबर न होगी!"

इस आवाज को सुनकर इन्द्रजीतसिंह बेचैन हो गये और जल्दी से आनन्दसिंह से यह कहते हुए कि 'कमलिनी की आवाज मालूम पड़ती है!' मन्दिर के पीछे की तरफ झपटे और आनन्दसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले।


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अब हम फिर मायारानी की तरफ लौटते हैं और उसका हाल लिख कई गुप्त भेदों को लिखते हैं। मायारानी भी उस चिट्ठी को पूरा-पूरा पढ़ न सकी और बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ी। नागर तुरत उठी और भंडरिये में से एक सुराही निकाल लाई जिसमें बेदमुश्क का अर्क था। वह अर्क मायारानी के मुँह पर छिड़का जिससे थोड़ी देर बाद वह होश में आई और नागर की तरफ देखकर बोली, "हाय अफसोस, क्या सोचा था और क्या हो गया।"

नागर-खैर, जो होना था सो हो गया, अब इस तरह बदहवास होने से काम नहीं चलेगा। उठो और अपने को सम्हालो, सोचो-विचारो और निश्चय करो कि अब क्या करना चाहिए।

मायारानी-अफसोस, उस कम्बख्त ऐयार ने तो बड़ा भारी धोखा दिया, और मुझमे भी बड़ी भारी भूल हुई कि लक्ष्मीदेवी वाला भेद उसके सामने जुबान से निकाल