पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 3.djvu/५८

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उसने यह ताली भूतनाथ को दे दी और इस समय गोपालसिंह के पास से पाई थी परन्तु भूतनाथ का नाम लेना उसने उचित न जाना क्योंकि उसने यह ताली भूतनाथ को राजा गोपालसिंह की जान लेने के बदले में दी थी और यह बात बाबाजी से कहना उसे मंजूर न था इसीसे वह इस समय बहाना कर गई।

मायारानी और नागर को साथ लिए हुए बाबाजी वहाँ से रवाना हुए और उस खम्भे के पास पहुँचे जिस पर गरारीदार पहिया लगा हुआ था। अब मायारानी बड़ी उत्कण्ठा से देखने लगी कि बाबाजी किस तरह से दरवाजा खोलते हैं और इसलिए जब बाबाजी ने गरारीदार पहिये को घुमा कर सुरंग का दरवाजा खोला तो मायारानी को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि इसी पहिये को वह कई दफे उलट फेर कर घुमा चुकी थी मगर दरवाजा नहीं खुला था। मायारानी ने अब बड़े आग्रह से इसका सबब बाबाजी से पूछा और कहा कि “इसी पहिये को मैं पहले कई दफे घुमा चुकी थी मगर दरवाजा न खुला, इस समय क्योंकर खुल गया?” इसके जवाब में बाबाजी हँसकर बोले, “इसका सबब किसी दूसरे वक्त तुमसे कहूँगा क्योंकि समझाने में बहुत देर लगेगी और पहले उन कामों को बहुत जल्द कर लेना चाहिए जिनका करना आवश्यक है!”

यह जवाब सुनकर मायारानी चुप हो गई और यह सोच लिया कि खैर किसी दूसरे समय इसका पता लग जाएगा क्योंकि इस समय वह बाबाजी से बहुत ही दबी हुई थी और किसी बात में जिद करना उचित नहीं समझती थी। उधर बाबाजी ने दरवाजा खोलने का भेद जानबूझ कर मायारानी से छिपा रखा था, क्योंकि उसका भेद खोलना उन्हें मँजूर न था। यद्यपि मायारानी को उसका भेद मालूम न हुआ मगर हम अपने पाठकों को दरवाजा खोलने का भेद बताए देते हैं। लोहे के खम्भे पर जो गरारीदार पहिया था उसके घूमने से दरवाजा बन्द हो जाता था। परन्तु खोलने के समय उसे एक बँधे हुए अन्दाज से घुमाना पड़ता था। उस पहिये की इक्कीस दफे बाईं तरफ, इसके बाद बारह दफे दाहिनी तरफ और नौ दफे बाईं तरफ घुमाने से दरवाजा खुलता था। अगर इससे कुछ भी कम या ज्यादा पहिया घूम जाय तो दरवाजा नहीं खुलता था। दरवाजा खोलते समय बाबाजी ने बड़ी तेजी के साथ गिन कर पहिया घुमाया किन्तु मायारानी का उसकी गिनती की तरफ कुछ भी ध्यान न था, इसीलिए वह इस बात को समझ न सकी।

मायारानी और नागर को साथ लिये हुए जब बाबाजी सुरंग के बाहर निकले तो सवेरा हो चुका था, मगर सूर्य अभी नहीं निकला था। टीले पर से देखा तो चारों तरफ मैदान में सन्नाटा था इसलिए राय हुई कि इसी समय गोपालसिंह, भूतनाथ, देवीसिंह, कमलिनी और लाड़िली को निकाल कर बँगले में पहुँचा देना चाहिए। नागर दौड़ी हुई चली गई और लीला तथा लौंडियों को बुला लाई और इसके बाद सभी ने मिलकर पाँचों कैदियों को सुरंग से निकाल कर दारोगा वाले बँगले में पहुँचाया।

अब यह विचार होने लगा कि पाँचों कैदियों को फिस जगह कैद करना चाहिए,