पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 3.djvu/३९

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
38
 


थे, चोरी का माल लिए हुए उस जगह आ पहुंचे जहाँ मायारानी और उसकी लौंडियाँ बैठी बातें कर रही थीं। ये चोर गिनती में पाँच थे और उनके पीछे-पीछे कई सवार भी उनकी गिरफ्तारी के लिए चले आ रहे थे, जिनके घोड़ों की टापों की आवाज बखूबी आ रही थी। जब वे चोर मायारानी के पास पहुंचे, तो यह सोचकर कि पीछा करने वाले सवारों के हाथ से बचना मुश्किल है, वे चोरी का माल उसी जगह पटक कर आगे की तरफ भाग गये और इसके थोड़ी ही देर बाद वे कई सवार भी उसी जगह पर, जहाँ मायारानी थी, आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि कई आदमी बैठे हुए हैं, बीच में एक लालटेन जल रही है, और चोरी का माल भी उसी जगह पड़ा हुआ है। उन्हें निश्चय हो गया कि ये चोर हैं अतः उन्होंने मायारानी तथा उसकी लौंडियों को चारों तरफ से घेर लिया।


9

आधी रात का समय है, चाँदनी खिली हुई है। मौसम में पूरा-पूरा फर्क पड़ गया है। रात की ठंडी-ठंडी हवा अब प्यारी मालम होती है। ऐसे समय में उस सड़क पर जो काशी से जमानिया की तरफ गई है दो मुसाफिर धीरे-धीरे काशी की तरफ जा रहे हैं। ये दोनों मुसाफिर साधारण नहीं हैं, बल्कि अमीर बहादुर और दिलावर मालूम पड़ते हैं। दोनों की पोशाक बेशकीमत और सिपाहियाना ठाठ की है, तथा दोनों ही की चाल में दिलेरी और लापरवाही मालूम होती है। खंजर, कटार, तलवार, तीर-कमान और कमन्द से दोनों ही सजे हुए हैं और इस समय मस्तानी चाल से धीरे-धीरे टहलत हुए जा रहे हैं। इनके पीछे-पीछे दो आदमी दो घोड़ों की बागडोर थामे हुए जा रहे है। मगर ये दोनों साईस नहीं हैं बल्कि सिपाही और सवार मालूम होते हैं। दोनों मुसाफिर जाते-जाते ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ सड़क से कुछ हटकर पांचसात पेड़ों का एक झुण्ड था। दोनों वहाँ खड़े हो गए और उनमें से एक ने जोर से सीटी बजाई जिसकी आवाज सुनते ही पेड़ों की आड़ में से दस आदमी निकल आए और दूसरी सीटी की आवाज के साथ ही वे उन दोनों आदमियों के पास पहुँच हाथ जोडकर खड़े हो गए। उन सभी की पोशाक उस समय के डाकुओं की-सी थी। जांघिया पहने हुए, बदन में केबल एक मोटे कपड़े की नीमास्तीन, ढाल-तलवार लगाए और हाथों में एकएक गड़ासा लिए हुए थे, और सभी की बगल में एक-एक छोटा बटुआ भी लटक रहा था। इन दसों के आ जाने पर उन दो बहादुरों में से एक ने उनकी तरफ देखा और पूछा, "उसका कुछ पता लगा?"

एक डाकू-(हाथ जोड़ कर) जी हाँ, बल्कि वह काम भी बखूबी कर आये हैं,


1. मायारानी और उसकी लौंडियाँ मर्दाने वेश में थीं।