पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 3.djvu/२२८

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
227
 


अब यह बताइये कि यही जमीन खोदी जायेगी या कोई और?

बाबाजी-हाँ, यही जमीन खोदी जायेगी, बस, जल्दी करो, रात बहुत कम है। सिर्फ आठ-दस पत्थर उखाड़ डालो, दो हाथ से ज्यादा मोटो छत नहीं है।

दूसरा-बात-की-बात में सब काम ठीक किये देता है, कोई हर्ज नहीं।

इतना कहकर उन लोगों ने जमीन खोदने में हाथ लगा दिया और बाबाजी, मायारानी तथा शेरअलीखाँ में यों बातचीत होने लगी--

मायारानी—जिस राह से हम लोग आये हैं, उसी राह से अपने फौजी सिपाहियों को भी ले आते तो क्या हर्ज था?

बाबाजी-तुम बाज दफे बच्चों की सी बात करती हो। एक तो वह तिलिस्मी रास्ता इस लायक नहीं कि उस राह से हम सैकड़ों फौजी आदमियों को ला सके। क्या जाये या कैसी आफत आ पड़े, सिवाय इसके सैकड़ों बल्कि हजारों आदमियों पर तिलिस्मी गुप्त भेदों का प्रकट कर देना क्या मामुली बात है? अगर ऐसा होता तो बुजुर्ग लोग जिन्होंने इस किले और तिलिस्म को तैयार किया है यह रास्ता क्यों बनाते जिसे इस समय हम लोग खोद रहे हैं? इसे भी जाने दो, सबसे भारी बात सोचने की यह है कि इस तिलिस्मी रास्ते से जिधर से हम लोग आये हैं, हमारी फ़ौज इस किले में तब पहुँच सकती है जब वह इस पहाड़ के ऊपर चढ़ आये मगर यह कब हो सकता कि हजारों आदमी इस पहाड़ पर चढ़ आवें और किले वालों को खबर तक न हो। ऐसा होना बिल्कुल असम्भव है, मगर जब हम इस रास्ते को खोल देगे तो हमारे फौजी सिपाहियों को पहाड पर चढ़ने की जरूरत न रहेगी, क्योंकि इसका दुसरा मुहाना 'जस' नदी के किनारे पड़ता है जो इस पहाड़ के नीचे कुछ हटकर बहती है।

मायाराती-तो क्या यहाँ से उस नदी तक जाने के लिए पहाड़ के अन्दर हो अन्दर सीढियां बनी हुई हैं?

बाबाजी-बेशक ऐसा ही है। रास्ते के बारे में इस किले की अवस्था ठीक 'देवगढ़' की तरह समझनी चाहिए। मैं जहाँ तक खयाल करता हूँ यह रोहतासगढ़ का किला

1. देवगढ़' का किला हैदराबाद (दक्षिण) लगभग तीन सौ मील के उत्तर और पश्चिम के कोने में है। यह किला बहुत ऊँची पहाड़ी के ऊपर विचित्र ढंग का बना हुआ है जिसके देखने से आश्चर्य होता है। पहाड़ का बहुत बड़ा भाग छील-छालकर दीवार की जगह पर कायम किया गया है। पहाड़ के चारों तरफ एक खाई है, उसके बाद तिहरी दीवार है। अन्दर जाने का रास्ता किसी तरफ से मालूम नहीं होता। शहर उन तीनों दीवारों के बाहर बसा हुआ है और बाहर के शहरपनाह की बड़ी मजबूत दीवार है। पहाड़ काटकर अन्दर किले में जाने के लिए उसी तरह की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं जैसे किसी बजं या धरहरे के ऊपर चढ़ने के लिए होती हैं। उस राह से जानकार आदमी का भी बिना मशाल की रोशनी के सीढ़ियां चढ़कर किले के अन्दर जाना बहुत मुश्किल है। किले के अन्दर जहाँ वह रास्ता समाप्त हुआ है उसके मुह पर भारी लोहे का तवा इसलिए रखा हुआ है कि यदि कदाचित् दुश्मन इस रास्ते से घुस भी आवे तो तवे के ऊपर सैकड़ों मन लकड़ियां रखकर आग जला दी जाय जिसमें उसकी गर्मी से दुश्मन अन्दर-ही-अन्दर जल मरें। इस किले में पानी के कई हौज हैं और एक सौ साठ

(शेष पृष्ठ 328 पर देखें)