पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 3.djvu/२१३

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हों और जूठा छोड़ने की इच्छा न होती हो तो कह दीजियो कि 'रोहतासमठ का पुजारी' आया है।

यह बात नकाबपोश ने इस ढंग से कही कि दाई ठहरने या पुनः कुछ पूछने का साहस न कर सकी। किवाड़ बन्द करके दौड़ती हुई नानक के पास गई और सब हाल कहा। 'रोहतासमठ का पुजारी' आया है इस शब्द ने नानक को बेचैन कर दिया। उसके हाथ में इतनी भी ताकत न रही कि गोश्त के टुकड़े को उठा कर अपने मुंह तक पहुँचा देता। लाचार उसने घबड़ाई हुई आवाज में गज्जू बाबू से कहा- "आधे घण्टे के लिए मुझे माफ कीजिये। उस आदमी से बातचीत करना कितना आवश्यक है सो आप इसी से समझ सकते हैं कि घर में आप ऐसा दोस्त और सामने की भरी थाली छोड़कर जाता हूँ। आपकी भाभी साहिबा आपको खुले दिल से खिलावेंगी। (अपनी स्त्री से) दो-चार गिलास आसव का भी इन्हें देना।".

इतना कहकर अपनी बात का बिना कुछ जवाब सुने ही नानक उठ खड़ा हुआ। अपने हाथ से गगरी उँडेल हाथ-मुँह धो दरवाजे पर पहुंचा और किवाड़ खोलकर बाहर चला गया। यद्यपि इस समय नानक ने तकल्लुफ की टांग तोड़ डाली थी तथापि उसके चले जाने से गज्जू बाबू को किसी तरह का रंज न हुआ, बल्कि एक तरह की खुशी हुई और उन्होंने अपने दिल में कहा, 'चलो इनसे भी छुट्टी मिली।

दरवाजे के बाहर पहुँच कर नानक ने उस नकाबपोश को देखा और बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ के मकान से कुछ दूर ले गया। जब ऐसी जगह पहुंचा जहाँ उन दोनों की बातें सुनने वाला कोई दिखाई नहीं दिया तव नानक ने बातचीत आरंभकी।

नानक—मैं तो आवाज ही से पहचान गया था कि मेरे दोस्त आ पहुँचे, मगर लौंडी को इसलिए दरवाजे पर भेजा था कि मालूम हो जाय कि आप किस ढंग से आए हैं और किस प्रकार की खबर लाए हैं। जब लौंडी ने आपकी तरफ से 'रोहतासगढ़ के पूजारी' का परिचय दिया, बस कलेजा दहल उठा, मालूम हो गया कि खबर जरूर भयानक होगी।

नकाबपोश-बेशक ऐसी ही बात है। कदाचित् तुम्हें यह सुन कर आश्चर्य होगा कि तुम्हारा बहुत दिनों का खोया हुआ बाप अर्थात् भूतनाथ अब मैदान की ताजी हवा खाने योग्य नहीं रहा।

नानक हैं, सो क्यों?

नकाबपोश—उसका दुर्दैव जो बहुत दिनों तक पारे में चाँदी की तरह छिपा हआ था, एकदम प्रकट हो गया। उसने तुम्हारी माँ को भी अष्टम चन्द्रमा की तरह कृपा-दष्टि से देख लिया और साढ़ेसाती के कठिन शनि को भी तुमसे जैगोपाल करने के लिए कहला भेजा है, पर इससे यह न समझना कि ज्योतिषियों के बताये हए दान का फल बन कर मैं तुम्हारी रक्षा के लिए आया हूँ। अब तुम्हें भी यह उचित है कि आजकल के ज्योतिषियों के कर्म-भण्डार से फलित विद्या की तरह जहाँ तक हो सके, जल्द अन्तर्धान हो जाओ।

नानक—(डर कर) अफसोस, तुम्हारी आदत किसी तरह कम नहीं होती। दो

च० स०-3-13