पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 3.djvu/११७

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रात बीत गई। सवेरा होने पर दारोगा ने दरियाफ्त किया तो मालूम हुआ कि इन्द्रदेव यहां नहीं हैं। एक आदमी ने कहा कि तीन-चार दिन के बाद आने का वादा करके कहीं चले गये हैं और यह कह गए हैं कि आप और मायारानी तब तक यहां से जाने का इरादा न करें। अब बाबाजी को मालूम हुआ कि दुनिया में उनका साथी कोई भी नहीं है और उनके बुरे कर्मों पर ध्यान देकर कोई भी उनकी मदद नहीं कर सकता। उन्हें अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना ही होगा।


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दारोगा साहब को मकान में बैठ कर झक मारते हुए चार दिन बड़ी मुश्किल से बीते और आज पाँचवाँ दिन है। जैसे ही बाबाजी अपनी चारपाई पर से उठ कर बाहर निकले वैसे ही एक आदमी ने आकर संदेश दिया कि "इन्द्रदेवजी आपको बुलाते हैं, मायारानी को साथ लेकर नजरबाग में जाइये।" यह सुनते ही बाबाजी लौट कर मायारानी के कमरे में गए और मायारानी को साथ लिये हुए उसी नजरबाग में पहुंचे, जहाँ पहले दिन उनकी नसीहत की गई थी। बाबाजी और मायारानी ने देखा कि इन्द्रदेव एक कुर्सी पर बैठा हुआ है और उसके बगल में दो कुर्सियां खाली पड़ी हैं, उसके सामने दो आदमी नागर के दोनों बाजू पकड़े खड़े हैं। नागर का हाथ पीठ के पीछे मजबूती के साथ बँधा हुआ है। इन्द्रदेव ने दारोगा और मायारानी को बैठने का इशारा किया और वे उन कुर्सियों पर बैठ गए जो इन्द्रदेव के बगल में खाली पड़ी हुई थीं।

बाबाजी की अवस्था देख कर मायारानी को निश्चय हो गया था कि इन्द्रदेव ने मदद से साफ-साफ इनकार कर दिया है और इसी से बाबाजी उदास और बेचैन हैं, मगर इस समय नागर को अपने सामने बेबस खड़ी देख कर मायारानी को कुछ ढाढस हुई और उसने सोचा कि बाबाजी की उदासी का कोई दूसरा ही कारण होगा, इन्द्रदेव हम लोगों की मदद अवश्य करेगा।

पाठक महाशय समझ ही गए होंगे कि नागर को गिरफ्तार कराने वाला इन्द्रदेव ही है जिसका हाल ऊपर एक बयान में लिख चुके हैं, और जिस श्यामलाल ने नागर को गिरफ्तार किया था वह इन्द्रदेव का कोई ऐयार होगा या स्वयं इन्द्रदेव ही होगा।

इन्द्रदेव के बगल में जब मायारानी और दारोगा बैठ गए तो इन्द्रदेव ने नागर से पूछा, "क्या बाबाजी की नाक तूने ही काटी?"

नागर-जी हाँ, मैंने मायारानी की आज्ञा पाकर इनकी नाक काटी है।

इन्द्रदेव—(अपने आदमी से) अच्छा, अब तुम इस कम्बख्त नागर की नाक और उसके साथ कान भी काट लो और यदि कुछ बोले तो जुबान भी काट लो!

हक्म की देर थी, नौकर मानो पहले ही से नाक काटने के लिए तैयार था, अस्तु इस समय जो कुछ होना था हो गया और इसके बाद नागर कैदखाने में भेज दी गई।

च० स०-3-7