पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 3.djvu/१०७

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दारोगा–बेशक ऐसा ही है और मैं उसका बहुत भरोसा रखता हूँ। उसकी बदौलत मैं अपने को राजा से भी बढ़ के अमीर समझता हूँ और वीरेन्द्रसिंह की कैद से छूटकर आजादी के साथ घूमने का दिन भी मुझे उसी के उद्योग से मिला है जिसका हाल मैं तुमसे फिर कहूंगा। वह बड़ा ही धूर्त एवं बुद्धिमान और साथ ही इसके ऐयाश

मायारानी-उम्न में आपसे बड़े हैं या छोटे?

दारोगा-ओह, मुझसे बहुत छोटा है बल्कि यों कहना चाहिए कि अभी नौजवान है, बदन में ताकत भी खूब है, रहने का स्थान भी बहुत ही उत्तम और रमणीक है, मेरी तरह फकीरी भेष में नहीं रहता बल्कि अमीराना ठाठ के साथ रहता है।

दारोगा की बात सुनकर मायारानी के दिल में एक प्रकार की उम्मीद और खुशी पैदा हुई, आँखों में विचित्र चमक और गालों पर सुर्खी दिखाई देने लगी जो क्षणभर के लिए थी, इसके बाद फिर मायारानी ने कहा

मायारानी—यह आपकी कृपा है कि ऐसी बुरी अवस्था तक पहुँचने पर भी मैं किसी तरह निराश नहीं हो सकती।

दारोगा-जब तक मैं जीता और तुझसे खुश हूँ तब तक तो तू किसी तरह निराश कभी भी नहीं हो सकती मगर अफसोस अभी तीन-चार दिन ही हुए हैं कि इसके पास से तेरी खोज में गया था, आज मेरी नाक कटी देखेगा तो क्या कहेगा?

मायारानी-बेशक उन्हें बड़ा क्रोध आवेगा जब आपकी जबानी यह सुनेंगे कि नागर ने आपकी यह दशा की।

दारोगा-क्रोध! अरे तू देखेगी कि नागर को पकड़वा मंगायेगा और बड़ी दुर्दशा से उसकी जान लेगा। उसके आगे यह कोई बड़ी बात नहीं है! लो, अब हम लोग ठिकाने आ पहुँचे, अब घोड़े से उतरना चाहिए।

इस जगह पर एक छोटी-सी पहाड़ी थी जिसके पीछे की तरफ और दाहिने बाएँ कुछ चक्कर खाता हुआ पहाड़ियों का सिलसिला दूर तक दिखाई दे रहा था। जब ये दोनों आदमी उस पहाड़ी के नीचे पहुँचे तो घोड़े से उतर पड़े क्योंकि पहाड़ी के ऊपर घोड़ा ले जाने का मौका न था और इन दोनों को पहाड़ी के ऊपर जाना था। दोनों घोड़े लम्बी-लम्बी बागडोरों के सहारे एक पेड़ के साथ बाँध दिए गए और इसके बाद मायारानी को साथ लिए हुए दारोगा ने उस पहाड़ी के ऊपर चढ़ना शुरू किया। उस पहाड़ी पर चढ़ने के लिए केवल एक पगडण्डी का रास्ता था और वह भी बहुत पथरीला और ऐसा ऊबड़-खाबड़ था कि जाने वाले को बहुत सम्हल कर चढ़ना पड़ता था। यद्यपि पहाड़ी बहुत ऊँची न थी, मगर रास्ते की कठिनाई के कारण इन दोनों को ऊपर पहुँचने में पूरा एक घण्टा लग गया।

जब दोनों पहाड़ी के ऊपर पहुँचे तो मायारानी ने एक पेड़ के नीचे खड़े होकर देखा कि सामने की तरफ जहाँ तक निगाह काम करती है, पहाड़-ही-पहाड़ दिखाई दे रहे हैं, जिनकी अवस्था आसाढ़ के उठते हुए बादलों-सी जान पड़ती है। टीले पर टीला, पहाड़ पर पहाड़, क्रमशः बराबर ऊँचा ही होता गया है। यह वही विंध्य की