पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 3.djvu/१०६

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मगर तेरी जुबानी सब हाल सुनकर मुझे इस बात का बहुत रंज हुआ कि तूने राजा गोपालसिंह के बारे में मुझे पूरा धोखा दिया।

मायारानी-बेशक यह मेरा कसूर है मगर वह कसूर पुराना हो गया और धोखे में लक्ष्मीदेवी का भेद खुल जाने पर तो अब वह क्षमा के योग्य भी हो गया। अगर आप उस कसूर को भूल कर बचने का उद्योग न करेंगे तो बेशक मेरी और आपकी दोनों की जान दुर्गति के साथ जायगी, क्योंकि मैं फिर भी ढिठाई के साथ कहती है कि उस विषय में मेरा और आपका कसूर बराबर है

दारोगा—बेशक ऐसा ही है, खैर, मैं तेरा कसूर माफ करता हूँ क्योंकि तूने इस समय उसे साफ-साफ कह दिया और यह भी निश्चय हो गया कि आज केवल नागर हरामजादी ने...

मायारानी—(अपने घोड़े को पास ले जाकर और दारोगा का पैर छूकर) केवल माफ ही नहीं बल्कि उद्योग करना चाहिए जिसमें राजा गोपालसिंह, वीरेन्द्रसिंह, उनके दोनों लड़के और ऐयार गिरफ्तार हो जाये या दुनिया से उठा दिए जायें।

दारोगा-ऐसा ही होगा और शीघ्र ही इसके लिए मैं उत्तम उद्योग करूँगा। (कुछ सोचकर) मगर मैं देखता हूँ कि इस काम के लिए रुपये की बहुत जरूरत है।

मायारानी–रुपये-पैसे की किसी तरह कमी नहीं हो सकती, मेरे पास लाखों रुपये के जवाहरात हैं बल्कि देवगढ़ी का खजाना ऐसा गुप्त है कि सिवा मेरे कोई दूसरा पा ही नहीं सकता क्योंकि गोपालसिंह को उसकी कुछ भी खबर नहीं है।

दारोगा—(ताज्जुब से) देवगढ़ी का खजाना कैसा? मैं भी उस विषय में कुछ नहीं जानता।

मायारानी-वाह, आप क्यों नहीं जानते! वह मकान आप ही ने तो धनपत को दिया था।

दारोगा-ओह देवगढ़ी क्यों कहती हो, शिवगढ़ी कहो!

मायारानी- हाँ,-हाँ, शिवगढ़ी, शिवगढ़ी, मैं भूल गई थी, नाम में गलती हुई। उसमें बड़ी दौलत है। जो कुछ मैंने धनपत को दिया सब उसी में मौजूद है, धनपत बेचारा कैद ही हो गया, फिर निकालता कौन?

दारोगा—बेशक वहाँ दौलत होगी। इसके सिवाय मुझे भी तुम दौलत से खाली न समझना, अस्तु कोई चिन्ता नहीं, देखा जायगा।"

मायारानी-मगर अभी तक यह न मालूम हुआ कि आप कहां जा रहे हैं? घोड़े बहुत थक गये हैं, अब यह ज्यादा नहीं चल सकते।

दारोगा-हमें भी अब बहुत दूर नहीं जाना है, (उँगली के इशारे से बताकर) वह देखो सामने जो पहाड़ी है उसी पर मेरा गुरुभाई इन्द्रदेव रहता है, इस समय हम लोग उसी के मेहमान होंगे।

मायारानी-ओहो, अब याद आया, इन्हीं का जिक्र आप अक्सर किया करते थे और कहते थे कि बड़े चालाक और प्रतापी हैं। आपने एक दफे यह भी कहा था कि इन्द्रदेव भी किसी तिलिस्म के दारोगा हैं।