पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 2.djvu/१९४

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
194
 

भूतनाथ ने दो-तीन घण्टे के लिए वहाँ आराम करना पसन्द किया। जामुन के पेड़ के नीचे गठरी उतार कर रख दी और आप भी उसी जगह जमीन पर चादर बिछा कर लेट गया। थोड़ी देर बाद जब सुस्ती जाती रही तो उठ बैठा, कुएँ के जल से हाथ-मुँह धोकर कुछ मेवा खाया जो उसके बटुए में था और इसके बाद लखलखा सुंघा नागर को होश में लाया। नागर होश में आकर उठ बैठी और चारों तरफ देखने लगी। जब सामने बैठे भूतनाथ पर नजर पड़ी तो समझ गई कि कमलिनी की आज्ञानुसार यह मुझे कहीं लिए जाता है।

नागर––यह तो मैं समझ ही गई कि कमलिनी ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और उसी की आज्ञा से तू मुझे लिए जाता है, मगर यह देख कर मुझे ताज्जुब होता है कि कैदी होने पर भी मेरे हाथ-पैर क्यों खुले हैं और मेरी बेहोशी क्यों दूर की गई?

भूतनाथ––तेरी बेहोशी इसलिए दूर की गयी कि जिसमें तू भी इस दिलचस्प मैदान और यहाँ की साफ हवा का आनन्द उठा ले। तेरे हाथ-पैर बँधे रहने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि अब मैं तेरी तरफ से होशियार हूँ, तू मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, दूसरे तेरे पास वह अँगूठी भी अब नहीं रहीं जिसके भरोसे तू फूली हुई थी, तीसरे (खंजर की तरफ इशारा करके) यह अनूठा खंजर भी मेरे पास मौजूद है, फिर किसका डर है? इसके अलावा उन कागजों को भी मैं जला चुका जो तेरे पास थे और जिनके सबब से मैं तुम लोगों के आधीन हो रहा था।

नागर––ठीक है, अब तुझे किसी का डर नहीं है, मगर फिर भी मैं इतना कहे बिना न रहूँगी कि तू हम लोगों के साथ दुश्मनी करके कोई फायदा नहीं उठा सकता और राजा वीरेन्द्रसिंह तेरा कसूर कभी माफ न करेंगे।

भूतनाथ––राजा वीरेन्द्रसिंह अवश्य मेरा कसूर माफ करेंगे और जब मैं उन कागजों को जला ही चुका तो मेरा कसूर साबित भी कैसे हो सकता है?

नागर––ऐसा होने पर भी तुझे सच्ची खुशी इस दुनिया में नहीं मिल सकती और राजा वीरेन्द्रसिंह के लिए जान दे देने पर भी तुझे उनसे कुछ विशेष लाभ नहीं हो सकता।

भूतनाथ––सो क्यों? वह कौन सच्ची खुशी है जो मुझे नहीं मिल सकती?

नागर––तेरे लिए सच्ची खुशी यही है कि तेरे पास इतनी धन-दौलत हो कि तू बेफिक्र होकर अमीरों की तरह जिन्दगी काट सके और तेरे पास तेरी वह प्यारी स्त्री भी हो जो काशी में रहती थी और जिसके पेट से नानक पैदा हुआ है।

भूतनाथ––(चौंक कर) तुझे यह कैसे मालूम हुआ कि वह मेरी ही स्त्री थी?

नागर––वाह-वाह, क्या मुझसे कोई बात छिपी रह सकती है? मालूम होता है नानक ने तुझसे वह सब हाल नहीं कहा जो तेरे निकल जाने के बाद उसे मालूम हआ था और जिसकी बदौलत नानक को उस जगह का पता लग गया जहाँ किसी के खून से लिखी हुई किताब रक्खी हुई थी?

भूतनाथ––नहीं, नानक ने मुझसे वह सब हाल नहीं कहा, बल्कि वह यह भी नहीं जानता कि मैं ही उसका बाप हूँ, हाँ, खून से लिखी किताब का हाल मुझे मालूम है।

नागर––शायद वह किताब अभी तक नानक ही के कब्जे में है।