पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 1.djvu/८१

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कितने ही बेचैन क्यों न हों मगर पहाड़ों से टक्कर खाते हुए सुबह की ठण्डी-ठण्डी हवा के झोंकों के डपटने और हिला कर जताने से उन छोटे-छोटे जंगली फूलों के पौधों की तरफ नजर डाल ही देते हैं जो दूर तक कतार बाँधे मस्ती से झूम रहे हैं, उन क्यारियों की तरफ ताक ही लेते हैं जिनके फूल ओस के बोझ से तंग हो टहनियाँ छोड़ पत्थर के ढोकों का सहारा ले रहे हैं, उन साखू और शीशम के पत्तों की घनघनाहट सुन ही लेते हैं जो दक्खिन से आती हुई सुगन्धित हवा को रोक, रहे-सहे जहर को चूस, गुणकारी बना उन तक आने का हुक्म देते हैं।

इन दो आदमियों में से एक तो लगभग बीस वर्ष की उम्र का बहादुर सिपाही है जो ढाल-तलवार के अलावा हाथ में तीर-कमान लिये बड़ी मुस्तैदी से खड़ा है, मगर दूसरे के बारे में हम कुछ नहीं कह सकते कि वह कौन या किस दर्जे और इज्जत का आदमी है। इसकी उम्र चाहे पचास से ज्यादे क्यों न हो मगर अभी तक इसके चेहरे पर वल का नाम-निशान नहीं है, जवानों की तरह खूबसूरत चेहरा दमक रहा है, बेशकीमत पोशाक और हरबों की तरफ खयाल करने से तो यही कहने को जी चाहता है कि किसी फौज का सेनापति है, मगर नहीं, उसका रुआबदार और गम्भीर चेहरा इशारा करता है कि यह कोई बहुत ही ऊँचे दर्जे का आदमी है जो कुछ देर खड़ा एकटक वायुकोण की तरफ देख रहा है।

सूर्य की किरणों के साथ ही साथ लाल वर्दी में बेशुमार फौजी आदमी उत्तर से दक्खिन की तरफ जाते दिखाई पड़े जिससे इस वहादुर का चेहरा जोश में आकर और भी दमक उठा और यह धीरे से बोला, "लो, हमारी फौज भी आ पहुँची!"

थोड़ी ही देर में वह फौज इस पहाड़ी के नीचे आकर रुक गई जिस पर ये दोनों खड़े थे और एक आदमी पहाड़ी के ऊपर चढ़ता हुआ दिखाई दिया जो बहुत जल्द इन दोनों के पास पहुँच कर सलाम कर खड़ा हो गया।

इस नये आये हुए आदमी की उम्र भी पचास से कम न होगी। इसके सिर और मूँछों के बाल चौथाई सुफेद हो चुके थे। कद के साथ-साथ खूबसूरत चेहरा भी कुछ लम्बा था। इसका रंग सिर्फ गोरा ही न था, बल्कि अभी तक रगों में दौड़ती हुई खून की सुर्खी इसके गालों पर अच्छी तरह उमड़ रही थी, बड़ी-बड़ी स्याह और जोश भरी आँखों में गुलाबी डोरियां बहुत भली मालूम होती थीं। इसकी पोशाक ज्यादे कीमत की या कामदार न थी, मगर कम दाम की भी न थी। उम्दे और मोटे स्याह मखमल की यह पोशाक इतनी चुस्त थी कि उसके अंगों की सुडौली कपड़े के ऊपर से जाहिर हो रही थी। कमर में सिर्फ एक खंजर और लपेटा हुआ कमन्द दिखाई देता था, बगल में सुर्ख मखमल का एक वटुआ भी लटक रहा था।

पाठकों को ज्यादा देर तक हैरानी में न डाल कर साफ-साफ कह देना ही पसन्द करते हैं कि यह तेजसिंह हैं और इनके पहले पहुँचे हुए दोनों आदमियों में एक राजा वीरेन्द्रसिंह और दूसरे उनके छोटे लड़के कुँअर आनन्दसिंह हैं, जिनके लिए हमें ऊपर कुछ फजूल बक जाना पड़ा।

राजा वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह कुछ देर तक सलाह करते रहे, इसके बाद तीनों