पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 1.djvu/५१

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बाकरअली-यारो, गजब मत करो!

भैरोंसिंह-हाँ साहब, हम लोग गजब करते हैं। खैर लीजिए, अब एक पैसा न माँगेंगे। जी में समझ लेंगे खैरात किया, अब चुनार भी न जायेंगे (उठना चाहता है)।

शिवदत्तसिंह-अजी, घबराते क्यों हो! जो कुछ तुमने कहा है वह हम देते हैं। (बाकर से) क्या तुम्हारी शामत आयी है!

महाराज शिवदत्त ने बाकरअली को ऐसी डाँट बताई कि बेचारा चुपके से जा खड़ा हुआ। हजार अशर्फियाँ मँगवा कर भैरोंसिंह के आगे रख दी गईं, ये लोग अपने अपने बटुए में रख उठ खड़े हुए, यह भी न पूछा कि तुम्हारा कौन कैद हो गया जिसके लिए इतना सह रहे हो? हाँ शिवदत्तगढ़ के बाहर होते-होते इन लोगों ने पता लगा ही लिया कि भीमसेन किसी ऐयार के पंजे में पड़ गया है।

शिवदत्तगढ़ के बाहर होकर सीधे चुनार का रास्ता लिया। दूसरे दिन शाम को जब चुनार पन्द्रह कोस बाकी रह गया, सामने से एक सवार तेज घोड़ा फेंकता हुआ इसी तरफ आता दिखाई पड़ा। पास आने पर भैरोंसिंह ने पहचाना कि शिवदत्त का लड़का भीमसेन है।

भीमसेन ने इन ऐयारों के पास पहुँच कर घोड़ा रोका और हँसकर भैरोंसिंह की तरफ देखा जिसे वह बखूबी पहचानता था।

भैरोंसिंह-क्यों आपको छुट्टी मिली? (अपने साथियों की तरफ देख कर) महाराज शिवदत्त के पुत्र कुमार भीमसेन यही हैं।

भीमसेन-आप ही लोगों की रिहाई पर मेरी छुट्टी बदी थी। आप लोग चले आये, तो मैं क्यों रोका जाता?

भैरोंसिंह-हमारे किस साथी ने आपको गिरफ्तार किया?

भीमसेन-सो मुझे मालूम नहीं, शिकार खेलते समय घोड़े पर सवार एक औरत ने पहुँच कर नेजे से मुझे जख्मी किया। जब मैं बेहोश हो गया तो मुश्कें बाँध एक खोह में ले गई और इलाज करके आराम किया। आगे का हाल आप जानते ही हैं, मुझे यह न मालूम हुआ कि वह औरत कौन थी मगर इसमें शक नहीं कि थी वह औरत ही।

भैरोंसिंह-खैर, अब आप अपने घर जाइये, मगर देखिए आपके पिता ने व्यर्थ लोगों से वैर बाँध रक्खा है। जब वे राजकुमार वीरेन्द्रसिंह के कैदी हो गये थे उस वक्त हमारे महाराज सुरेन्द्र सिंह ने उन्हें बहुत तरह से समझा कर कहा था कि आप हम लोगों से वैर छोड़ चुनार में रहें, हम चुनार की गद्दी आपको फेर देते हैं। उस समय तो हजरत को फकीरी सूझी थी, योगाभ्यास की धुन में प्राण की जगह बुद्धि को ब्रह्माण्ड में चढ़ा ले गये थे लेकिन अब फिर गुदगुदी मालूम होने लगी। खैर, हमें क्या, उनकी किस्मत में जन्म-भर दुःख ही भोगना बदा है तो कोई क्या करे! इतना भी नहीं सोचते कि जब चुनार के मालिक थे तब तो कुंअर वीरेन्द्रसिंह से जीते नहीं, अब न मालूम क्या साहब, हम कर लेंगे!

भीमसेन-मैं सच कहता हूँ कि उनकी बातें मुझे पसन्द नहीं मगर क्या करूँ, पिता के विरुद्ध होना धर्म नहीं।