पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 1.djvu/२६

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गंगाजी की सैर करने और दिल बहलाने के लिए जिद की, लाचार उनकी बात माननी ही पड़ी।

एक छोटी-सी खूबसूरत और तेज जाने वाली किश्ती पर सवार हो इन्द्रजीतसिंह ने चाहा कि किसी को साथ न ले जायें सिर्फ दोनों भाई ही सवार हों और खे कर दरिया की सैर करें। किसकी मजाल थी जो इनकी बात काटता, मगर एक पुराने खिदमतगार ने जिसने कि वीरेन्द्रसिंह को गोद में खिलाया था और अब इन दोनों के साथ रहता था ऐसा करने से रोका और जब दोनों भाइयों ने न माना तो वह खुद किश्ती पर सवार हो गया। पुराना नौकर होने के खयाल से दोनों भाई कुछ न बोले, लाचार साथ ले जाना ही पड़ा।

आनन्दसिंह-किश्ती को धारा में ले जाकर बहाव पर छोड़ दीजिये। फिर खे कर ले आवेंगे।

इन्द्रजीतसिंह-अच्छी बात है।

सिर्फ दो घण्टे दिन बाकी था जब दोनों भाई किश्ती पर सवार हो दरिया की सैर करने को गए क्योंकि लौटते समय चाँदनी रात का भी आनन्द लेना मंजूर था।

चुनार से दो कोस पश्चिम गंगा के किनारे पर एक छोटा-सा जंगल था। जब किश्ती उसके पास पहुंची, वंशी की और साथ ही गाने की बारीक सुरीली आवाज इन लोगों के कानों में पड़ी। संगी एक ऐसी चीज है कि हर एक के दिल को चाहे वह कैसा ही नासमझ क्यों न हो अपनी तरफ खींच लेती है, यहाँ तक कि जानवर भी इसके वश में होकर अपने को भूल जाता है। दो-तीन दिन से कुँअर इन्द्रजीतसिंह का दिल चुटीला हो रहा था, दरिया की बहार देखना तो दूर रहा, इन्हें अपने तन-बदन की भी सुध न थी। ये तो अपनी प्यारी तस्वीर की में सिर धुन झुकाए बैठे कुछ इनके हिसाब चारों तरफ सन्नाटा था, मगर इस सुरीली आवाज ने इनकी गर्दन घुमा दी और उस तरफ देखने को मजबूर किया जिधर से वह आ रही थी।

किनारे की तरफ देखने से यह तो मालूम न हुआ कि वंशी बजाने या गाने वाला कौन है मगर इस बात का अन्दाज जरूर मिल गया कि वे लोग बहुत दूर नहीं हैं जिनके गाने की आवाज सुनने वालों पर जादू का सा असर कर रही है। इन्द्रजीतसिंह-आहा, क्या सुरीली आवाज है!

आनन्दसिंह-दूसरी आवाज भी आई। बेशक कई औरतें मिल कर गा-बजा रही हैं।

इन्द्रजीतसिंह-(किश्ती का मुँह किनारे की तरफ फेर कर) ताज्जुब है कि इन लोगों ने गाने-बजाने और दिल बहलाने के लिए ऐसी जगह पसन्द की। जरा देखना चाहिए।

आनन्दसिंह-क्या हर्ज है, चलिए।

बूढ़े खिदमतगार ने किनारे पर किश्ती लगाने और उतरने के लिए मना किया और बहुत समझाया मगर इन दोनों ने न माना। किश्ती किनारे लगाई और उतर कर उस तरफ चले जिधर से आवाज आ रही थी। जंगल में थोड़ी ही दूर जाकर दस-पन्द्रह सोच रहे थे,