पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 1.djvu/२३

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तरफ देखकर) क्यों तेज?

तेजसिंह-(हाथ जोड़कर) जी हाँ, शिकारगाह में डेरा कायम रहने से हम लोग बड़ी खूबसूरती और दिल्लगी से अपना काम निकाल सकेंगे।

सुरेन्द्रसिंह-कोई ऐयार शिवदत्तगढ़ से लौटे तो कुछ हाल-चाल मालूम हो।

तेजसिंह-कल तो नहीं, मगर परसों तक कोई-न-कोई जरूर आयेगा। पहर भर से ज्यादे देर तक बातचीत होती रही। कुल वात को खोलना हम मुनासिब नहीं समझते बल्कि आखिरी बात का पता तो हमें भी न लगा जो मजलिस उठने के बाद जीतसिंह ने अकेले में तेजसिंह को समझायी थी। खैर, जाने दीजिए, जो होगा देखा जायगा, जल्दी क्या है।

गंगा के किनारे ऊँची बारहदरी में इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह दोनों भाई बैठे जल की कैफियत देख रहे हैं। बरसात का मौसम है, गंगा खूब बढ़ी हुई हैं, किले के नीचे जल पहुँचा है, छोटी-छोटी लहरें दीवारों में टक्कर मार रही हैं, अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा जल में पड़ कर लहरों की शोभा दूनी बढ़ा रही है, सन्नाटे का आलम है, इस बारहदरी में सिवाय इन दोनों भाइयों के कोई तीसरा दिखाई नहीं देता।

इन्द्रजीतसिंह-अभी जल कुछ और बढ़ेगा।

आनन्दसिंह-जी हाँ, पिछले साल तो गंगा आज से कहीं ज्यादा बढ़ी हुई थीं, जब दादाजी ने हम लोगों को तैरकर पार जाने के लिए कहा था।

इन्द्रजीतसिंह-उस दिन भी खूब ही दिल्लगी हुई, भैरोंसिंह सभी में तेज रहा, बद्रीनाथ ने कितना ही चाहा कि उसके आगे निकल जाय, मगर न हो सका।

आनन्दसिंह-हम दोनों भी कोस भर दूर तक उस किश्ती के साथ ही गए जो हम लोगों की हिफाजत के लिए संग गयी थी।

इन्द्रजीतसिंह-बस वही तो हम लोगों का आखिरी इम्तिहान रहा, फिर तब से जल में तैरने की नौबत ही कहाँ आयी।

आनन्दसिंह-कल तो मैंने दादाजी से कहा था कि आजकल गंगाजी खूब बढ़ी हुई हैं, तैरने को जी चाहता है।

इन्द्रजीतसिंह-तब क्या बोले?

आनन्दसिंह–कहने लगे कि बस, अब तुम लोगों का तैरना मुनासिब नहीं है, हँसी होगी। तैरना भी एक इल्म है जिसमें तुम लोग होशियार हो चुके। अब क्या जरूरत है? ऐसा ही जी चाहे तो किश्ती पर सवार होकर जाओ, सैर करो।

इन्द्रजीतसिंह-उन्होंने बहुत ठीक कहा, चलो किश्ती पर थोड़ी दूर घूम आयें। बातचीत हो ही रही थी कि चोबदार ने आकर अर्ज किया, "एक बहुत बूढ़ा जवहरी हाजिर है, दर्शन करना चाहता है।"

आनन्दसिंह—यह कौन-सा वक्त है?

चोबदार—(हाथ जोड़कर) ताबेदार ने तो चाहा था कि इस समय उसे बिदा करे मगर यह खयाल करके ऐसा करने का हौसला न पड़ा कि एक तो लड़कपन ही से वह इस दरबार का नमकख्वार है और महाराज की भी उस पर निगाह रहती है, दूसरे