पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 1.djvu/२१९

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
211
 

नानकप्रसाद-उसी रामभोली की, जो तुम्हारे घोड़े पर सवार होकर चली गई।

औरत-(चौंक कर) क्या नाम लिया? जरा फिर तो कहो!

नानकप्रसाद-रामभोली।

औरत-(हँस कर) बहुत ठीक, तू मेरी सखी अर्थात् उस औरत को कब से जानता है?

नानकप्रसाद—(कुछ चिढ़कर और मुँह बनाकर) उसे मैं लड़कपन से जानता हूँ, मगर तुम्हें सिवाय आज के कभी नहीं देखा, वह तुम्हारी सखी क्योंकर हो सकती है?

औरत-तू झूठा बेवकूफ और उल्लू बल्कि उल्लू का इत्र है! तू मेरी सखी को क्या जाने, जब तू मुझे नहीं जानता तो उसे क्योंकर पहचान सकता है?

उस औरत की बातों ने नानक को आपे से बाहर कर कर दिया। वह एकदम चिढ़ गया और गुस्से में आकर म्यान से तलवार निकालकर बोला-

नानकप्रसाद-कम्बख्त औरत, तू मुझे बेवकूफ बनाती है! जली-कटी बातें कहती है और मेरी आँखों में धूल डालना चाहती है! अभी तेरा सिर काटके फेंक देता हूँ!

औरत-(हँसकर) शाबाश, क्यों न हो, आप जवाँमर्द जो ठहरे! (नानक के मुँह के पास चुटकियाँ बजाकर) चेत ऐंठासिंह, जरा होश की दवा कर!

अब नानकप्रसाद बर्दाश्त न कर सका और यह कहकर कि 'ले, अपने किये का फल भोग!' उसने उस औरत पर तलवार का वार किया। औरत ने फर्ती से अपने को बचा लिया और हाथ बढ़ा नानक की कलाई पकड़ जोर से ऐसा झटका दिया कि तलवार उसके हाथ से निकलकर दूर जा गिरी और नानक आश्चर्य में आकर उसका मुंह देखने लगा। औरत ने हँस कर नानक से कहा, "बस, इसी जवाँमर्दी पर मेरी सखी से ब्याह करने का इरादा था! बस, जा और हिजड़ों में मिलकर नाचा कर!"

इतना कहकर औरत हट गई और पश्चिम की तरफ रवाना हुई। नानक का क्रोध अभी शान्त नहीं हुआ था। उसने अपनी तलवार, जो दूर पड़ी हुई थी, उठाकर म्यान में रख ली और कुछ सोचता हुआ तथा दाँत पीसता हुआ उस औरत के पीछे-पीछे चला। वह औरत इस इस बात से भी होशियार थी कि नानक पीछे से आकर धोखे में तलवार न मारे, वह कनखियों से पीछे की तरफ देखती जाती थी।

थोड़ी दूर जाने के बाद वह औरत एक कुएँ पर पहुँची जिसका संगीन चबूतरा एक पूर्से से कम ऊँचा न था। चारों तरफ चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। कआँ बहुत बड़ा और खूबसुरत था। वह औरत कुएँ पर चली गई और बैठ कर धीरे-धीरे कुछ गाने लगी।

समय दोपहर का था, धूप खूब निकली हुई थी, मगर इस जगह कुएँ के चारों तरफ घने पेड़ों की ऐसी छाया थी और ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी कि नानक की तबीयत खश हो गई। क्रोध, रंज और बदला लेने का ध्यान बिल्कुल ही जाता रहा, जिस पर उस औरत की सुरीली आवाज ने और भी रंग जमाया। वह उस औरत के सामने जाकर वैठ गया और उसका मुँह देखने लगा। दो ही तीन तान लेकर वह औरत चुप हो गई