पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 1.djvu/१८

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ये चारों आदमी थोड़ी देर तक वहाँ और अटकने के बाद बाबाजी से विदा हो खेमे में आये।

जब सन्नाटा हुआ तो भैरोंसिंह ने इन्द्रजीतसिंह से कहा-"मेरे दिमाग में इस समय बहुत-सी बातें घूम रही हैं। मैं चाहता हूँ कि हम लोग चारों आदमी एक जगह बैठ कमेटी कर कुछ राय पक्की करें।"

इन्द्रजीतसिंह ने कहा-"अच्छा, आनन्द और तारा को भी इसी जगह बुला लो।"

भैरोंसिंह गये और आनन्दसिंह तथा तारासिंह को उसी जगह बुला लाए। उसवक्त सिवाय इन चारों के उस खेमे में और कोई न रहा। भैरोंसिंह ने अपने दिल का हाल कहा, जिसे सभी ने बड़े गौर से सुना। इसके बाद पहर भर तक कमेटी करके निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए।

यह कमेटी कैसी हुई, भैरोंसिंह का क्या इरादा हुआ और उन्होंने क्या निश्चय किया तथा रात-भर ये लोग क्या करते रहे, इसके कहने की कोई जरूरत नहीं, समय पर सब खुल जाएगा।

सवेरा होते ही चारों आदमी खेमे के बाहर हुए और अपनी फौज के सरदार कंचनसिंह को बुलाकर कुछ समझा कर बाबाजी की तरफ रवाना हुए। जब लश्कर से दूर निकल गए, आनन्दसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह तो तेजी के साथ चुनार की तरफ रवाना हुए और इन्द्रजीतसिंह अकेले बाबाजी से मिलने गए।

बाबाजी शेरों के बीच धूनी रमाये बैठे थे। दो शेर उनके चारों तरफ घूम-घूम कर पहरा दे रहे थे। इन्द्रजीतसिंह ने पहुँच कर प्रणाम किया और बाबाजी ने आशीर्वाद देकर बैठने के लिए कहा।

इन्द्रजीतसिंह ने बनिस्बत कल के आज दो शेर और ज्यादा देखे। थोड़ी देर चुप रहने के बाद बातचीत होने लगी।

बाबाजी-कहो इन्द्रजीतसिंह, तुम्हारे भाई और ऐयार कहाँ रह गए? वे क्यों नहीं आए?

इन्द्रजीतसिंह-हमारे छोटे भाई आनन्दसिंह को बुखार आ गया, इस सबब से वह नहीं आ सका। उसी की हिफाजत में दोनों ऐयारों को छोड़ मैं अकेला आपके दर्शन को आया हूँ।

बाबाजी-अच्छा क्या हर्ज है, आज शाम तक वह अच्छे हो जाएंगे। कहो आज कल तुम्हारे राज्य में कुशल तो है?

इन्द्रजीतसिंह-आपकी कृपा से सब आनन्द है।

बाबाजी–बेचारे वीरेन्द्रसिंह ने भी बड़ा कष्ट पाया! खैर जो हो, दुनिया में उनका नाम रह जाएगा। इस हजार वर्ष के अन्दर कोई ऐसा राजा नहीं हुआ जिसने तिलिस्म तोड़ा हो। एक और तिलिस्म है, असल में वही भारी और तारीफ के लायक है।

इन्द्रजीतसिंह-पिताजी तो कहते हैं कि वह तिलिस्म तेरे हाथ से टूटेगा।