पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 1.djvu/१७८

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सोच रही थी, लाली और कुन्दन के बारे में भी गौर कर रही थी। यकायक वह उठ बैठी और धीरे से आप-ही-आप बोली, "अब मुझे खुद कुछ करना चाहिए, इस तरह पड़े रहने से काम नहीं चलता। मगर अफसोस, मेरे पास कोई हरबा भी तो नहीं है।"

किशोरी पलंग के नीचे उतरी और कमरे में इधर-उधर टहलने लगी, आखिर कमरे के बाहर निकली।। देखा कि पहरेदार लौंडियाँ खूब गहरी नींद में सो रही हैं। रात आधी से ज्यादा जा चुकी थी, चारों तरफ अँधेरा छाया हुआ था। धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई कुन्दन के मकान की तरफ बढ़ी। जब पास पहुँची तो देखा कि एक आदमी काले कपड़े पहने उसी तरफ लपका हुआ जा रहा है, बल्कि उस कमरे के दालान में पहुँच गया जिसमें कुन्दन रहती है। किशोरी एक पेड़ की आड़ में खड़ी हो गई, शायद इसलिए कि वह आदमी लौट कर चला जाय तो आगे बढ़ूँ।

थोड़ी देर बाद कुन्दन भी उसी आदमी के साथ बाहर निकली और धीरे-धीरे बाग के उस तरफ रवाना हुई, जिधर घने दरख्त लगे हुए थे। जब दोनों उस पेड़ के पास पहुंचे जिसकी आड़ में किशोरी छिपी हुई थी, तब वह आदमी रुका और धीरे से बोला-

आदमी-अब तुम जाओ, ज्यादा दूर तक पहुँचाने की कोई जरूरत नहीं।

कुन्दन-फिर भी मैं कहे देती हूँ कि अब पाँच-सात दिन तक 'नारंगी' की कोई जरूरत नहीं।

आदमी-खैर, मगर किशोरी पर दया बनाये रहना!

कुन्दन-इसके कहने की कोई जरूरत नहीं।

वह आदमी पेड़ों के झुण्ड की तरफ चला गया और कुन्दन लौट कर अपने कमरे में चली गई। किशोरी भी फिर वहाँ न ठहरी और अपने कमरे में आकर पलंग पर लेट रही, क्योंकि उन दोनों की बातों ने, जिन्हें किशोरी ने अच्छी तरह सुना था, उसे परेशान कर दिया और वह तरह-तरह की बातें सोचने लगी। मगर अपने दिल का हाल किससे कहे? इस लायक वहां कोई भी न था।

पहले तो किशोरी बनिस्बत कुन्दन के लाली को सच्ची और नेक समझती थी, मगर अब वह बात न रही। किशोरी उस आदमी के मुंह से निकली हुई उस बात को फिर याद करने लगी कि "किशोरी पर दया बनाये रहना।"

वह आदमी कौन था? इस बाग में आना और यहाँ से निकल कर जाना तो बड़ा ही मुश्किल है, फिर वह क्यों कर आया! उस आदमी की आवाज पहचानी हुई सी मालूम होती है। बेशक मैं उससे कई दफे बातें कर चुकी हूं मगर कब और कहाँ सो याद नहीं पड़ता और न उसकी सूरत का ध्यान बंधता है। कुन्दन ने कहा था, "पाँच-सात दिन तक नारंगी की कोई जरूरत नहीं।" इससे मालूम होता है कि नारंगी वाली बात कुछ उस आदमी से सम्बन्ध रखती है और लाली उस भेद को जानती है। इस समय तो यह निश्चय हो गया कि कुन्दन मेरी खैरख्वाह है और लाली मुझसे दुश्मनी किया चाहती है। मगर इसका भी विश्वास नहीं होता। कुछ भेद खुला मगर इससे तो और भी उलझन हो गई। खैर, कोशिश करूँगी तो कुछ औ