पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 1.djvu/१०५

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गई। वह शैतान का बच्चा बहुत ही दिलेर और लड़ाका था, फौरन ढाल-तलवार ले मकान के नीचे उतर आया, और अपने यहाँ रहने वाले कई सिपाहियों को साथ ले बाग के दरवाजे पर पहुँचा। देखा कि बहुत से सिपाहियों की लाशें जमीन पर पड़ी हुई हैं और दुश्मन का पता नहीं है।

बाग के चारों तरफ फैले हुए सिपाही भी फाटक पर आ जुटे थे और गिनती में एक सौ से ज्यादा थे। अग्निदत्त ने सभी को ललकारा और साथ ले इन्द्रजीतसिंह का पीछा किया। थोड़ी ही दूर पर उन लोगों को पा लिया, और चारों तरफ से घेर, मारकाट शुरू कर दी।

अग्निदत्त की निगाह किशोरी पर जा पड़ी। अब क्या पूछना था? सब तरफ का खयाल छोड़ इन्द्रजीतसिंह के ऊपर टूट पड़ा। बहुत से आदमियों से लड़ते हुए इन्द्रजीतसिंह किशोरी को सँभाल न सके, और उसे छोड तलवार चलाने लगे, अग्निदत्त को मौका मिला, इन्द्रजीतसिंह के हाथ जख्मी होने पर भी उसने दम न लिया और किशोरी को गोद में उठा ले भागा। यह देखकर इन्द्रजीतसिंह की आँखों में खून उतर आया। इतनी भीड़ को काटकर उसका पीछा तो न कर सके, मगर अपने ऐयारों को ललकार कर इस तरह की लड़ाई की, कि उन सौ में से आधे बेदम होकर जमीन पर गिर पड़े, और बाकी अपने सरदार को चला गया देख जान बचा भाग गये। इन्द्रजीतसिंह भी बहुत से जख्मों के लगने से बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। चपला और भैरोंसिंह वगैरह बहुत ही बेदम हो रहे थे, तो भी वे लोग बेहोश इन्द्रजीतसिंह को उठा वहाँ से निकल गये, और फिर किसी की निगाह पर न चढ़े।

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जख्मी इन्द्रजीतसिंह को लिए हुए उनके ऐयार लोग वहाँ से दूर निकल गए और बेचारी किशोरी को दुष्ट अग्निदत्त उठाकर अपने घर ले गया। यह सब हाल देख तिलोत्तमा वहाँ से चलती बनी और बाग के अन्दर कमरे में पहुँची। देखा कि सुरंग का दरवाजा खुला हुआ है और ताली भी उसी जगह जमीन पर पड़ी है। उसने ताली उठा ली और सुरंग के अन्दर जा किवाड़ बन्द करती हुई माधवी के पास पहुँची। माधवी की अवस्था इस समय बहुत ही खराब हो रही थी। दीवान साहब पर बिल्कुल भेद खुल गया होगा, यह समझ मारे डर के वह घबरा गई और उसे निश्चय हो गया कि अब किसी तरह कुशल नहीं है, क्योंकि बहुत दिनों की लापरवाही में दीवान साहब ने तमाम रिआया और फौज को अपने कब्जे में कर लिया था। तिलोत्तमा ने वहाँ पहुँचते ही माधवी से कहा-

तिलोत्तमा–अब क्या सोच रही है और क्यों रोती है? मैंने पहले ही कहा था कि इन बखेड़ों में मत फँस, इसका नतीजा अच्छा न होगा! वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग