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१४ १०९ - (रीलेड्स ७५; मशी) गाउम्मीद शुदने राव अज मुसने रसूलान व बाज गर्दानीदने ईशान रा (दूतोंकी यात सुनार राषका निराश होना और उन्हें लौटागा) यात संजोग बसिठ जो कहा । नाइ मॅड सुन राजा रहा ॥१ पसिठ पचन विस भरे सुनाये । राजै ठग गै लाइ खाये ॥२ गा अमरो मनहुत जो सँजोवा । भा निरास चित भीतर रोवा ॥३ सरग चाँद में पाई नाहीं । पसिठों उत्तर देउँ उठ जाहीं ॥४ आज साँझ जो चाँद न पाऊँ । पहर रात तुम्ह सरग चलाऊँ ॥५ जीउ दान जो चाहु, पठउँ चाँद दिवाइ ६ नतरु सूर उवत गढ़ तोरों, कहु पहर सों जाइ ॥७ पाटान्तर-काशी प्रति : 'शीर्षक-जवार दादने राव रूपचन्द रमान रा (दूतोको राव रूपचन्द का उत्तर) --मुनावा; २-राजे ग टग लाट्ट सावा; ३-म; ४-यसहि ५--पठयह ६-~यह ७-सो। टिप्पणी-(१) नाइ-झुमा पर । -सिर । (२) गा--गया। अपरा-आरारा, आशा । (७) नतर-नही तो। ११० (रीलेण्टम ७६) राज आमदने रसूलान पर महर व याच नमदने अर्जे राव रूपचन्द (दूताश पापस भाकर राय रूपचन्दयी मांग कहना) पसिठ बहुरि गोबर महें आये । महर देसि जिन आगे धाये ॥१ पूछा महर कुमर सो आयहु । का कहु कम उतर पायहु ॥२ जस पूज तम यसिटौं कहा । मुनें नहिं राजा कोह के रहा ॥३ हस्ति घोड़ धन दरव न मान । चाँद मॉगि जिन सूर न जाने ॥४ जो जिउ चाँदा पीउहि दीन्हाँ । तो तू राउ चाहु जिउ लीन्हा ।।५