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१३० साकी रगका रेशमी वस बताया है (कास्ट्यूम्स एण्ड टेक्सटाइल्स इन सल्तनत पीरसड, पृ. ५२)। सम्भवतः उन्होंने यह अनुमान उसरे चीकट वाली पहचानरे आधारपर क्यिा है। (बनारसकी पोलीमें सामान्यत चीकट अत्यन्त मैले यस्तो कहते है)। हमारा अनुमान है कि नपवा वही वस्त्र है जिसका उल्लेखसे जोवणवारपरिधानविधि नामक वर्णरमे चक्पा नामते विना गया है। (वर्णसमुच्चय, पृ० १८०)। चक्वटा (स. चस्पट) क्सिी ऐसे बलरा नाम होगा जिसपर चर अथवा पूल बना रहता रहा होगा | भोजन समय पहनने वारे रूपमें यह निसन्देह रेशमी रहा होगा । धीर-आइन-ए अरवरी में सोनेरे पाम दिये हुए वो चीर कहा गया है। शैकडिया- इसका उल्लेख पृथ्वीचन्द्रचरितम भी हुआ है और सम्भवत इसीका उल्लेख वर्णपसमहमें चौपादीय रूपम हुआ है। गुजराती में इसे चौकडी कहते हैं। जॉन अविनने सत्तरहवीं दाती भारतीय वस्त्र व्यवसायका को अध्ययन प्रस्तुत दिया किया है, उसमें उन्होने से सस्ते पिला चारसानेदार सती कपड़ा बताया है। हो सस्ता है। यह उडीसाम बनने वाला रेशम और सूतमिश्रित वस्त्र हो जो चारखाना कहा जाता था ( मोनोग्राफ आन सिल्क, युसुफ अली, पृ. २३)। (३) मुगिया-इसरे वई अर्थ हो सकते है: (१) मुंगेरे रगवा रेदामी वन, (२) आगमका मुप्रसिद्ध मूंगा रेशम, (३) भूगीपटन (पैटन) की बनी मुप्रसिद्ध साडी। यह स्थान औरगाबादसे २० मील दक्षिण पश्चिम है और मध्यसाल्में अपने वस्त्रोंके लिए प्रसिद्ध था। महिला-वर्णक सम्मुच्चयम मण्टील और माण्डलिया नामक वस्त्रीया उन्लेख हुआ है। जान अग्निने मटिला नामर वस्नको सम और रात मिश्रित धारीदार यस्त्र सताया है, जो काफी चटपीला होता था । यह वस्त्र पगाल्में माल्दा कासिमपाडार क्षेत्रमें तैयार होता था। माप्दलियारे सम्बन्धम मोतीचन्द्रकी धारणा है कि वह उत्तर गुजरात मॉडरोपयको तैयार होता था । पदरी-चूदगे । (४) परमहरा दागीतलयो रहते है। एकसण्टसे तात्पर्य एस र बाला धमी है। जाप-छपा हुआ। गुजराती--गुलरावका हुआ। इसका कराती पाट भी सम्भव है। उस अवस्थामें इसका अर्थ होगा कानो रगका। (१) दरिया--सम्मत धारीदार व जिसे पारसी दरियाई का ग्या है।सरा दुरिया अधारा दुरिया पाठ भी सभव है । डुरिया (डोरिया) धारीगर वसा कहते है किन्नु ना मूती होता है। चंदरीटा-दापन पदमारतमे नंदनीय नामा नम्का उल्लेख मिया? (१२:३)