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गोदान
 


सवों की नस पहचानती हूँ। सब-के-सब भौंरे रस लेकर उड़ जानेवाले। मैं भी उन्हें ललचाती हूँ,तिरछी नजरों से देखती हूँ, मसकराती हूँ। वह मुझे गधी बनाते हैं,मैं उन्हें उल्लू बनाती हूँ। मैं मर जाऊँ,तो उनकी आँखों में आँसू न आयेगा। वह मर जायँ,तो मैं कहूँगी,अच्छा हुआ,निगोड़ा मर गया। मैं तो जिसकी हो जाऊँगी,उसकी जनम-भर के लिए हो जाऊँगी,सुख में,दुःख में,सम्पत में,बिपत में,उसके साथ रहूँगी। हरजाई नहीं हूँ कि सबसे हँसती-बोलती फिरूँ। न रुपए की भूखी हूँ,न गहने-कपड़े की। बस भले आदमी का संग चाहती हूँ, जो मुझे अपना समझे और जिसे मैं भी अपना समझू। एक पण्डित जी बहुत तिलक-मुद्रा लगाते हैं। आध सेर दूध लेते हैं। एक दिन उनकी घरवाली कहीं नेवते में गयी थी। मुझे क्या मालूम। और दिनों की तरह दूध लिये भीतर चली गयी। वहाँ पुकारती हूँ, बहूजी,बहूजी! कोई बोलता ही नहीं। इतने में देखती हूँ तो पण्डितजी बाहर के किवाड़ वन्द कियं चले आ रहे हैं। मैं समझ गयी इसकी नीयत खराब है। मैंने डाँटकर पूछा--तुमने किवाड़ क्यों बन्द कर लिये? क्या बहूजी कही गयी हैं? घर में सन्नाटा क्यों है?

उसने कहा-वह एक नेवते में गयी हैं;और मेरी ओर दो पग और बढ़ आया।

मैने कहा--तुम्हें दूध लेना हो तो लो,नहीं मैं जाती हूँ। बोला--आज तो तुम यहाँ से न जाने पाओगी झूनी रानी, रोज-रोज कलेजे पर छुरी चलाकर भाग जाती हो,आज मेरे हाथ से न बचोगी। तुमसे सच कहती हूँ गोवर,मेरे रोएँ खड़े हो गय।।

गोबर आवेश में बोला-मैं बच्चा को देख पाऊँ,तो खोदकर जमीन में गाड़ दूं। खून चूस लूं। तुम मुझे दिखा तो देना।

'सुनो तो, ऐसों का मुंह तोड़ने के लिए मैं ही काफी हूँ। मेरी छाती धक-धक करने लगी। यह कुछ बदमासी कर बैठे, तो क्या करूँगी। कोई चिल्लाना भी तो न सुनेगा;लेकिन मन में यह निश्चय कर लिया था कि मेरी देह छुई,तो दूध की भरी हाँड़ी उसके मुंह पर पटक दूंगी। बला से चार-पाँच सेर दूध जायगा, बचा को याद तो हो जायगी। कलेजा मजबूत करके बोली-इस फेर में न रहना पण्डितजी!मैं अहीर की लड़की हूँ। मूंछ का एक-एक बाल चुनवा लूंगी। यही लिखा है तुम्हारे पोथी-पत्रे में कि दूसरों की बहू-बेटी को अपने घर में बन्द करके बेइज्जत करो। इसीलिए तिलक-मुद्रा का जाल विछाये बैठे हो? लगा हाथ जोड़ने,पैरों पड़ने-एक प्रेमी का मन रख दोगी,तो तुम्हारा क्या बिगड़ जायगा,झूना रानी! कभी-कभी गरीबों पर दया किया करो,नहीं भगवान पूछेगे,मैंने तुम्हें इतना रूपधन दिया था,तुमने उससे एक ब्राह्मण का उपकार भी नहीं किया, तो क्या जवाब दोगी? बोले,मैं विप्र हूँ,रुपए-पैसे का दान तो रोज ही पाता हूँ,आज रूप का दान दे दो।

'मैने यों ही उसका मन परखने को कह दिया,मैं पचास रुपए लूंगी। सच कहती हूँ गोबर,तुरन्त कोठरी में गया और दस-दस के पाँच नोट निकालकर मेरे हाथों में देने लगा और जब मैंने नोट जमीन पर गिरा दिये और द्वार की ओर चली,तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। मैं तो पहले ही से तैयार थी। हाँड़ी उसके मुंह पर दे मारी। सिर से पाँव