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गोदान
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मिलेंगे,उधर दोनों भाइयों को बाँट दूंगा। चार दिन की ज़िन्दगी में क्यों किसी से छलकपट करूँ। नहीं कह दूं कि बीस रुपए सैकड़े में बेचे हैं तो उन्हें क्या पता लगेगा। तुम उनसे कहने थोड़े ही जाओगे। तुम्हें तो मैंने बराबर अपना भाई समझा है।

व्यवहार में हम 'भाई' के अर्थ का कितना ही दुरुपयोग करें,लेकिन उसकी भावना में जो पवित्रता है,वह हमारी कालिमा से कभी मलिन नहीं होती।

होरी ने अप्रत्यक्ष रूप से यह प्रस्ताव करके चौधरी के मुँह की ओर देखा कि वह स्वीकार करता है या नहीं। उसके मुख पर कुछ ऐसा मिथ्या विनीत भाव प्रकट हुआ जो भिक्षा माँगते समय मोटे भिक्षुकों पर आ जाता है।

चौधरी ने होरी का आसन पाकर चाबुक जमाया--हमारा तुम्हारा पुराना भाई चारा है महतो,ऐसी बात है भला;लेकिन बात यह है कि ईमान आदमी बेचता है. तो किसी लालच से। बीस रुपाए नहीं मैं पन्द्रह रुपए कहूँगा;लेकिन जो बीस रुपए के दाम लो।

होरी ने खिसियाकर कहा--तुम तो चौधरी अन्धेर करते हो, बीस रुपए में कहीं ऐसे बाँस जाते है?

‘ऐसे क्या, इससे अच्छे बाँस जाते हैं दस रुपए पर, हाँ दस कोस और पच्छिम चले जाओ। मोल वाँस का नहीं है, शहर के नगीच होने का है। आदमी सोचता है,जितनी देर वहाँ जाने में लगेगी,उतनी देर में तो दो-चार रुपए का काम हो जायगा।'

{{Gapसौदा पट गया। चौधरी ने मिर्जई उतारकर छान पर रख दी और वाँस काटने लगा।

ऊख की सिंचाई हो रही थी। हीरा-बहू कलेवा लेकर कुएँ पर जा रही थी। चौधरी को बाँस काटते देखकर चूंघट के अन्दर से बोली--कौन बाँस काटता है? यहाँ वाँस न कटेंगे।

चौधरी ने हाथ रोककर कहा--बाँस मोल लिए हैं, पन्द्रह रुपए सैकड़े का बयाना हुआ है। सेंत में नहीं काट रहे हैं।

हीरा-बहू अपने घर की मालकिन थी। उसी के विद्रोह से भाइयों में अलगौझा हुआ था। धनिया को परास्त करके शेर हो गयी थी। हीरा कभी-कभी उसे पीटता था। अभी हाल में इतना मारा था कि वह कई दिन तक खाट से न उठ सकी,लेकिन अपना पदाधिकार वह किसी तरह न छोड़ती थी। हीरा क्रोध में उसे मारता था;लेकिन चलता था उसी के इशारों पर,उस घोड़े की भाँति जो कभी-कभी स्वामी को लात मारकर भी उसी के आसन के नीचे चलता है।)

कलेवे की टोकरी सिर से उतार कर बोली-पन्द्रह रुपए में हमारे बाँस न जायेंगे।

चौधरी औरत जात से इस विषय में बात-चीत करना नीति-विरुद्ध समझते थे। बोले-जाकर अपने आदमी को भेज दो। जो कुछ कहना हो,आकर कहें।

हीरा-बहू का नाम था पुन्नी। बच्चे दो ही हुए थे। लेकिन ढल गयी थी। बनावसिंगार से समय के आघात का शमन करना चाहती थी,लेकिन गृहस्थी में भोजन ही का ठिकाना न था, सिंगार के लिए पैसे कहाँ से आते। इस अभाव और विवशता ने