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गो-दान
 


ओंकारनाथ सैर करके लौटे थे और आज के पत्र के लिए सम्पादकीय लेख लिखने की चिन्ता में बैठे हुए थे;पर मन पक्षी की भाँति अभी उड़ा-उड़ा फिरता था। उनकी धर्मपत्नी ने रात में उन्हें कुछ ऐसी बातें कह डाली थीं जो अभी तक काँटों की तरह चुभ रही थीं। उन्हें कोई दरिद्र कह ले,अभागा कह ले,बुद्ध कह ले,वह जरा भी बुरा न मानते थे;लेकिन यह कहना कि उनमें पुरुषत्व नहीं है,यह उनके लिए असह्य था। और फिर अपनी पत्नी को यह कहने का क्या हक़ है? उससे तो यह आशा की जाती है कि कोई इस तरह का आक्षेप करे,तो उसका मुंह बन्द कर दे। बेशक वह ऐसी खबरें नहीं छापते,ऐसी टिप्पणियाँ नहीं करते कि सिर पर कोई आफ़त आ जाय। फूंँक-फूंँककर क़दम रखते हैं। इन काले कानूनों के युग में वह और कर ही क्या सकते हैं;मगर वह क्यों साँप के बिल में हाथ नहीं डालते? इसीलिए तो कि उनके घरवालों को कष्ट न उठाने पड़े। और उनकी सहिष्णुता का उन्हें यह पुरस्कार मिल रहा है? क्या अन्धेर है! उनके पास रुपए नहीं हैं,तो बनारसी साड़ी कैसे मँगा दें? डाक्टर सेठ और प्रोफेसर भाटिया और न जाने किस-किस की स्त्रियाँ बनारसी साड़ी पहनती हैं,तो वह क्या करें? क्यों उनकी पत्नी इन साड़ीवालियों को अपनी खद्दर की साड़ी से लज्जित नहीं करती? उनकी खुद तो यह आदत है कि किसी बड़े आदमी से मिलने जाते हैं, तो मोटे से मोटे कपड़े पहन लेते हैं और कोई कुछ आलोचना करे तो उसका मुंँहतोड़ जवाब देने को तैयार रहते हैं। उनकी पत्नी में क्यों वही आत्माभिमान नहीं है? वह क्यों दूसरों का ठाट-बाट देखकर विचलित हो जाती है? उसे समझना चाहिए कि वह एक देश-भक्त पुरुष की पत्नी है। देश-भक्त के पास अपनी भक्ति के सिवा और क्या सम्पत्ति है। इसी विषय को आज के अग्रलेख का विषय बनाने की कल्पना करते-करते उनका ध्यान राय साहब के मुआमले की ओर जा पहुंँचा। राय साहब सूचना का क्या उत्तर देते हैं,यह देखना है। अगर वह अपनी सफाई देने में सफल हो जाते हैं,तब तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर वह यह समझें कि ओंकारनाथ दबाव,भय,या मुलाहजे में आकर अपने कर्तव्य से मुंह फेर लेंगे तो यह उनका भ्रम है। इस सारे तप और साधन का पुरस्कार उन्हें इसके सिवा और क्या मिलता है कि अवसर पड़ने पर वह इन कानूनी डकैतों का भंडा-फोड़ करें। उन्हें खूब मालूम है कि राय साहब बड़े प्रभावशाली जीव हैं। कौसिल के मेम्बर तो हैं ही। अधिकारियों में भी उनका काफी रुसूख है। वह चाहें,तो उन पर झूठे मुक़दमे चलवा सकते हैं,अपने गुण्डों से राह चलते पिटवा सकते हैं; लेकिन ओंकार इन बातों से नहीं डरता। जब तक उसकी देह में प्राण है,वह आततायियों की खबर लेता रहेगा।

सहसा मोटरकार की आवाज़ सुन कर वह चौंके। तुरन्त कागज़ लेकर अपना लेख आरम्भ कर दिया। और एक ही क्षण में राय साहब ने उनके कमरे में क़दम रक्खा।

ओंकारनाथ ने न उनका स्वागत किया,न कुशल-क्षेम पूछा,न कुरसी दी। उन्हें इस तरह देखा मानो कोई मुलज़िम उनकी अदालत में आया हो और रोब से मिले हुए स्वर में पूछा--आपको मेरा पुरजा मिल गया था? मैं वह पत्र लिखने के लिए बाध्य