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गोस्वामी तुलसीदास


जिक मूल्य कुछ भी नहीं। ऊँची नीची श्रेणियाँ समाज में बराबर थीं और बराबर रहेंगी। अत: शूद्र शब्द को नीची श्रेणी के मनुष्य का—कुल, शील, विद्या, बुद्धि, शक्ति आदि सब में अत्यंत न्यून का—बोधक मानना चाहिए। इतनी न्यूनताओं को अलग अलग न लिखकर वर्ण-विभाग के आधार पर उन सबके लिये एक शब्द का व्यवहार कर दिया गया है। इस बात को मनुष्य-जातियों का अनुसंधान करनेवाले आधुनिक लेखकों ने भी स्वीकार किया है कि वन्य और असभ्य जातियाँ उन्हीं का आदर-सम्मान करती हैं जो उनमें भय उत्पन्न कर सकते हैं। यही दशा गँवारों की है। इस बात को गोस्वामीजी ने अपनी इस चौपाई में कहा है——

ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी॥

जिससे कुछ लोग इतना चिढ़ते हैं। चिढ़ने का कारण है 'ताड़न' शब्द जो ढोल शब्द के योग में आलंकारिक चमत्कार उत्पन्न करने के लिये लाया गया है। 'स्त्री' का समावेश भी सुरुचि-विरुद्ध लगता है; पर वैरागी समझकर उनकी बात का बुरा न मानना चाहिए।


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