पृष्ठ:गोस्वामी तुलसीदास.djvu/१४०

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
१३९
शील-निरूपण और चरित्र-चित्रण

वण आदर्श चित्रण के भीतर आवेंगे तथा दशरथ, लक्ष्मण, विभी- कैकयी सामान्य चित्रण के भीतर । आदर्श चित्रण में हम या तो यहाँ से वहाँ तक सात्त्विक वृत्ति का निर्वाह पावेंगे या तामस का। प्रकृति-भेद-सूचक अनेकरूपता उसमें न मिलेगी। सीता, राम, भरत. हनुमान ये सात्त्विक आदर्श हैं; सक्ण तामस आदर्श है। सात्त्विक आदर्शों का वर्णन हो चुका। हनुमान के संबंध में इतना समझ रखना आवश्यक है कि वे सेवक के आदर्श हैं। सेव्य- सेवक भाव का पूर्ण स्फुरण उनमें दिखाई पड़ता है। बिना किसी प्रकार के पूर्व परिचय के राम को देखते ही उनके शील, सौंदर्य और शक्ति के साक्षात्कार मात्र पर मुग्ध होकर पहले-पहल आत्म-समर्पण करनेवाले भक्तिराशि हनुमान ही हैं। उनके मिलते ही मानों भक्ति के आश्रय और आलंबन दोनों पक्ष पूरे हो गए और भक्ति की पूर्ण स्थापना लोक में हो गई। इसी गम-भक्ति के प्रभाव से हनुमान सब राम-भक्तों की भक्ति के अधिकारी हुए । सेवक में जो जो गुण चाहिएँ. सब हनुमान में लाकर इकट्ठे कर दिए गए हैं। सबसे आवश्यक बात तो यह है कि स्वामी के कार्यों के लिये, सब कुछ करने के लिये, उनमें निरलसता और तत्परता हम हर समय पाते हैं। समुद्र के किनार सब बंदर बैठे समुद्र पार करने की चिंता कर ही रहे थे, अंगद फिरने का संशय करके आगा-पीछा कर ही रहे थे कि वे चट समुद्र लाँघ गए । लक्ष्मण को जब शक्ति लगी तब वैद्य को भी चट हनुमान् ही लाए और ओषधि के लिये भी पवन-वेग से वे ही दौड़े। सेवक को अमानी होना चाहिए। प्रभु के कार्य-साधन में उसे अपने मान-अपमान का ध्यान न रखना चाहिए। अशोक-वाटिका में से पकड़कर राक्षस उन्हें रावण के सामने ले जाते हैं। रावण उन्हें अनेक दुर्वाद .