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तुलसीदास की भावुकता

बांधे बननिधि ? नीरनिधि ? जलधि सिंधु ? बारीस?

सत्य, तोयनिधि ? करती ? उदधि ? पयोधि ? नदीस ?

यह ऐसा ही है जैसा सहसा किसी का मरना सुनकर चक- पकाकर पूछना-'अरे कौन ? रामप्रसाद के बाप ? माताप्रसाद के लड़के ? शिवप्रसाद के भाई ? अमुक स्टेट के मैनेजर ?” इस भाव का प्रत्यक्षीकरण भी यह सूचित करता है कि गोस्वामीजी सब भावों को अपने अंत:करण में देखनेवाले थे, केवल लक्षण-ग्रंथों में देखकर उनका सन्निवेश करनेवाले नहीं।

दूसरों का उपहास करते तो आपने बहुत लोगों को देखा होगा, पर कभी आपने मनुष्य की उस अवस्था पर भी ध्यान दिया है जब वह पश्चात्ताप और ग्लानि वश अपना उपहास आप करता है ? गोस्वामीजी ने उस पर भी ध्यान दिया है। उनकी अंतर्दृष्टि के सामने वह अवस्था भी प्रत्यक्ष हुई है। सोने के हिरन के पीछे अपनी सोने की सीता को खोकर राम वन वन विलाप करते फिरते हैं; मृग उन्हें देखकर भागते हैं; और फिर जैसा कि उनका स्वभाव होता है, थोड़ी दूर पर जाकर खड़े हो जाते हैं। इस पर राम कहते हैं-

हमहि देखि मृग-निकर पराहीं। मृगी कहहिं तुम्ह कहं भय नाहीं॥

तुम आनंद करहु मृगजाए। कंचनमृग खोजन ये आए॥

कैसी क्षोभपूर्ण आत्मनिंदा है !

यहाँ एक और बात ध्यान देने की है। कवि ने मृगों के ही भय का क्यों नाम लिया ? मृगियों का भय क्यों नहीं था १ बात यह है कि आखेट की यह मर्यादा चली आती है कि मादा के ऊपर अस्त्र न चलाया जाय। शिकार खेलनेवालों में यह बात प्रसिद्ध है। यहाँ गोस्वामीजी का लोक-व्यवहार-परिचय प्रकट होता है।

देखिए 'श्रम' की व्यंजना किस कोमलता के साथ गोस्वामीजी करते हैं। सीता राम-लक्ष्मण के साथ पैदल वन की और चली हैं-