पृष्ठ:गोर्की की श्रेष्ठ रचनाएँ.djvu/९०

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1 - 1 . विदूषक उस चौकीदार ने, जो पीछे रह गया था , माचिस जलाई और पंजों पर ठ कर वहां कुछ हूंढने लगा । ___ " श्राहिस्ते चलो ! ” उसने कहा जब मैं उस के पास पाया । " मेरी सीटी पर पैर मत रख देना । वह यहीं कहीं गिर गई है । " "वह कौन है जिसे वे ले गए ? " मैंने पूछा । " ओह, कोई खास श्रादमी नहीं है । " " उसने क्या किया था ? " " अगर उसने कुछ नहीं किया होता तो वे उसे ले क्यों जाते ? " मुझे कुछ बेचैनी अनुभव हुई - कुछ चोट सी लगी । परन्तु मैंने सोचा और मुझे एक विजयी का मा सन्तोप हुआ ! " अच्छा, यह बात है ! " एक सप्ताह बाद मैंने उस विदूषक को फिर देखा । वह एक धन वेलाव की तरह मंच पर अजीय ढम से लुढ़क रहा था तथा उछल -कूद मा हा था । परन्तु मुझे ऐसा लगा कि वह अपना पार्ट पहले की तरह कुशलता पूर्वक श्रदा नहीं कर रहा है । वह पहले की तरह जनता का मनोरञ्जन करने में असमर्थ था । और जब मैंने यह देखा तो अपने को , किसी न किसी रूप में , इसके लेये अपराधी अनुभव किया ।