पृष्ठ:गोर्की की श्रेष्ठ रचनाएँ.djvu/१७३

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

बुदिया इजरगिल बिल विलाता रहता । स्वस्थ होने पर मैं उनके साथ उनके देश पोलेन्द्र को चली गई । " " जरा ठहरो ! उस छोटे तुर्क का क्या हुया " " यह लड़का ? मर गया । मैं नहीं जानती कि वह घर की याद में मरा या प्रेम के कारण परन्तु यह पीला पद गया - एक नए पौधे को तरह जो सूर्य की तेज धूप में मुरझा जाता है । वह धीरे २ सूसता गया । उसकी वह दशा अब भी मेरी आँखों के सामने चित्र के समान स्पष्ट हो उठती है । यह बर्फ के टुकडे की तरह बिलकुल नीला पट गया था परन्तु प्रेम की अग्नि अव भी उसके भीतर जल रही थी । वह मुझसे बराबर अपने उपर मुस्कर चूमने की प्रार्थना करता था । मैं उसे प्यार करती थी और मुझे याद है कि मैंने उसे खूब चूमा था । फिर उसको हालत बहुरा ग्राब हो गई । वह मुश्किल से चल फिर सकता था । गय्या पर लेटा हुया मुझपे अत्यन्त दोनतापूर्वक , एक भिवारी के समान, भोप सी माँगा करता कि मैं उसकी बगल में लेटर उसे गरमी पहुचाती रह । मैं उसकी बात मान लेती और जमे ही मैं उसके पास लेटनी यह धाग की तरह उत्तेजित हो उठना । एकबार जब में जगी तो बिलकुल ठण्डा पद गया था । उसको मृत्यु हो गई थी । मैं उसके ऊपर बहुत देर तक रोती रही । कौन कह सकता है कि शायद मन की उनको हस्या की थी । उस समय अवस्था में में टममें दुगनी बनी और पूर्ण स्वस्थ , सबल शीर उमाद से भरी हुई थी और वह " वर एक छोटा सा बालक था ! " उपने गहरी सांस ली - चौर मैंने पहली बार देगा कि टमने नीनवार फ्रोम का विष्ट बनाया और अपने मृब होठों ही छोटी में बदबा उठी । .. डा . ती नुम पोनेन्ट इन्नो गई , " मैंने टगे कहानी जारी करने लिए उमारा । .. " पान में मार । यह एक नीच पोर m व्यकि । उस में भारत की जरल होमी नो . राम शिलांट को ना निरमा पन्नता युवा मेरे पास जाता और मुनगे गर्म र समाव और