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२२ [गोरख-बानी सुसवदे' हीरा वेधिलेर अवधू जिभ्या करि टकसाल' । औगुंन मध्ये गुंन करिलै, तौ चेला सकल संसारं ॥ ६ ॥ अभरा था ते सुभर १० भरिया नीझर झरता रहिया ११ पांडे '२पुरसाण दुहेला १३, यू. १४सतगुरिमारग कहिया११॥६१॥ प्यं.१६ होइ ती पद की आसा, बनि१७ निपजै१८ चौतार। दूध होई तो घृत की पासा, करणीं करतव१९ सार॥६२ ।। ज्योति जगमगा रही है। इस प्रकाश के अपने ही भीतर चलते होने पर भी पशु तो धोख ही नहीं देखता ॥ १६ ॥ जिला की टकसाल यनाकर वहाँ अभेद्य परमतत्त्व रूप हीरे को सु-शब्द (सोहं हंसा, अजपामंत्र ) के द्वारा घो। इस प्रकार अवगुणमय असत् मायिक जगत में भी अपने लिए गुण (त्रैगुण्य नहीं सद्गुण) का नाम करलो थयात् सत का अनुभव करो। ऐसा होने पर सारा संसार तुम्हारा चेला हो जाएगः ॥ ६०॥ जो अभरा था (प्रमानुभूति से रहित होने के कारण खाली था) (योग की साधना से ) वह भी भर गया (अर्थात् ज्ञान पूर्ण हो गया, उसे ब्रह्मानु मूति हो गयी) उसके लिए निरंतर अमृत का निझर झरने लगा। (परन्तु जिस मार्ग से यह संभव होता है) गुरु का बताया हुथा वह मार्ग खङ्ग से भी तीपण और कठिन है। पुरसारण =धर शाण, शाणित चुर, सान में धरा तेज पर प्रहा घट घट त्यापी है। इसे लोग स्यूल अयं में यों समझते हैं कि शरीर में यह कही पर है। परन्तु यदि ऐसा सममें तो परमात्मा के शरीर में १. (प) यवद । २. (ग) विधि ले । ३. (ख) अवधुः (क) में नहीं। ४. (ग) कारिले । ५. (घ) श्रीगुग्ण मधे गुण; (ग) श्रीगण बंधे गुण । ६. (ख) (ग) रगिले: (घ) रचीले । ७. (क) तब । ८. (ग) (घ) सब । ९. (ख) टक- माल...मगार । १०. (ख) मुभर । ११. (ख), (घ) भरीया, रहीया, कहीया । १२. (म) पांडी पि, (ग) पांडा ये, (प) पांढा ते । १३. (ख) दुहेली। १४. (ग) प्यु, (ग) यो । १५. (स), (ग), (घ) सतगुर । १६. (क) प्यंडे; (ख) पड़े, ()दि। १७. (म) योग, (ग) यिषु (घ) पिणि । १८. (ख) निपजी । १६. मात्र, (4) फिरतर। ।