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परिशिष्ट-३ (१) प्रति के परिशेष में गोरखनाथ के २७ पदों का अपने ढंग का एक सुंदर तिजक दिया हुआ है, जो आगे दिया जाता है । वह किसी निरंजनी साधु का किया जान पड़ता है। क्योंकि उन्हीं के संप्रदाय के ग्रंथों की (घ) प्रति में अधिकता है । कर्ता का नाम दिया नहीं है। प्रति में पहले पूरे पद गये हैं, फिर तिलक । मैंने पदों की प्रथम पंक्ति ही दी है। सारे. पद को दुहराना व्यर्थ होता । पदक्रम भी मैंने प्रति का नहीं रक्खा है, बल्कि प्रतीकों के प्रथम अधारों को लेकर अधारानुक्रम से रक्खा है। इससे पदों को ठिने में सुदोता होगा । अवधू जाप जपो वनमाली चीन्हौ । जाप समझो विहि करि अगम जपीए । टेक । बदन प्रांन सुसम भजतां । काया कंचनी बसि होवै । तो ज होय चवै कहै। एक अक्षर यडाकार कुभक सुनि नाभि बाणी बसि हुई जो पिंड-ब्रह्मड में समतत है। द्वै अक्षरी दूजी नाड़ी। दोय पष पांन अपांन । तिहि करि भी पारि उतरे । त्र' अक्षरी सुषमन त्र मंत्र जपी । ब्रह्मकुंड ब्रह्मद्वार । चौ अक्षरी परा चारि षांणी चारि बांणी वसि हुई ॥१॥ अवधू बोल्या तत्व विचारी। अवधू बोल्या तत्व बिचारी । तत्व ईस्वर विचार । पृथी काया बंक सुरति । वली समाई । अष्टकुली हरबत काया। जल माया । देक । मन पवन परें अगम ईश्वर । रवि ससि तार गियाई। रवि ससि मन पवन तार तिमिर गियाई (गिघाय-यथा दृष्ट) गया। तीन गुण बिधि संसार नहीं । चारि जुग मैं बाई । सिधि करतां आया। पंच सहस मैं षट अपूठा पंच सहंस सुर कंवल, बाय घट प्राण कंवल सपत धात आठई वाय । मनी मनारी । द्वादस बाय कला त्रिकुट के विषै। चवदै