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२२६ [गोरख-बानी थंभा । सुरति निरति सोध्या। सुनि मैं समाया। अविगत सरूपी एवं उचितम्। पापे न लिप्यते पुन्ये न हारते२ जोगारम्भ भबे सिधा आवागवन निवर्तते ॐ नमो सिवाई नमो सिवाईश्री स्यं भुनाथ पादुका नमस्तुते। १. (घ) में अन्तिम वाक्य के स्थान पर यह है, 'येती पिंड ब्रह्मड का निरबाण बोलिए हो देवता ।' २. (6) में इस चरण के स्थान पर 'पठते हरते पापं भुत्वा मोक्ष दायक है । ३. (क) इसके आगे है 'उचारं विचारं पापा क्षयं जायंति'।