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[गोरख-बानी हसिवा लिबा धरिबा ध्यांन । अहनिसि कथिवा ब्रह्म गियांन' हसै पेलै न करै मन भंग। ते निहचल सदा नाथ के संग ॥८॥ महंमद महंमद न करि काजी महंमद का विषम बिचारं । महंमद हाथि५ करद६ जे होती लोहै घड़ी न सारं ॥९॥ सवर्दै मारी सब जिलाई ऐसा महंमद पीरं । ताकै१० भरमि न भूलौ११ काजी सो बल नहीं सरीरं २ ॥१०॥ हँसना, खेलना और ध्यान धरना चाहिए। रात दिन ब्रह्म ज्ञान का कथन करना चाहिए। इस प्रकार (संयम पूर्वक ) हंसते खेजते हुए जो अपने मन को भंग नहीं करते वे निश्चल होकर ब्रह्म के साथ रमण करते हैं ॥८॥ हे काजी 'मुहम्मद मुहम्मद' न करो। ( क्योंकि तुम मुहम्मद को जानते नहीं हो। तुम समझते हो कि जीव हत्या करते हुए हम मुहम्मद के मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं ) परन्तु मुहम्मद का विचार बहुत गंभीर और कठिन है। नुहम्मद के हाथ में जो छुरी थी वह न लोहे की गढ़ी हुई थी न इस्पात की जिससे जीव हत्या होती है। करद =क़र्द (अरबी) ॥१॥ ( जिस छुरी का प्रयोग मुहम्मद करते थे वह सूक्ष्म छुरी शब्द की छुरी थी।) यह शिष्यों की भौतिकता को इसी शब्द की छुरी से मारते थे जिससे वे संसार की विषय-वासनाओं के लिए मर जाते थे। परन्तु उन की यह शब्द की छुरी वस्तुतः जीवन-प्रदायिनी थी क्योंकि उन की वहिमुखता के नष्ट हो जाने पर ही उनका वास्तविक श्राभ्यंतर श्राध्यात्मिक जीवन प्रारम्भ होता था। मुहम्मद ऐसे पीर थे। हे काजियो, उनके भ्रम में न भूलो, तुम १. (ख) अहिनिसि...गिनांन । २. (क) रहै सिधौं के संग; (ख) रमै सिध कै सगि। ३. (ख), (ग), (घ) में यह शब्द अधिकतया 'महमंद लिखा गया है, केवल 'ख' में एक जगह महंमद लिखा है। ४. (ग) में 'न करिः के स्थान पर 'करिसि' है, जिसे प्रश्नवाचक मानना चाहिए (घ) 'म करिसि । ५. (ख) हाथे। ६. (ग) करंदा। ७. (घ) जू; (ख) में कुछ नहीं। (ग), (घ) 'लोहै। के पहले 'सो' । ६.(क) और (ख) गढ़ी। १०. (ख) ऐसे । ११. (क) भ्रमि मति भूलै । १२. (ग), (घ) में यह साखी नहीं है । (ख) में यह साखी इस प्रकार प्रारंभ होती है-सबदही मारी सबदही जीलाई।