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गोरख-बानी] एहवां' मद श्री गोरप केवट्या, बदंत मछींद्र ना पूता। जिनिकैवट्या तिनि भरि भरि पीया, अमर भया अवधूता ॥४॥२८॥ सति सति५ भाषत श्रीगोरष जोगी, अमे तौ रहिवा रंग। अलेष पुरिस जिनि गुर मुषि चीन्या, रहिबा तिसके संगें ॥ टेक ॥ सतजुग मधे जुग एक रचीला, बिसहर एक निपाया। ग्यांन विहूणां गण गंजप अवधू, सब ही डसि डसि षाया ॥१॥ त्रेता जुग मधे जुग दोइ रचीला, राम रमाइण कोन्हां । नर बंदर संव लडि लड़ि मूये, तिन भी ग्यांन न चीन्हां ॥२॥ द्वापर जुग मधे जुग तीनि रचीलै, बहु डम्बर बहु भार । कैरौं पांडौं लडि लड़ि मुये, नारद कीया संघारं ।३। कलिजुग मधे जुग चारि रचीला, चूकिला चार विचारं । घरि घरि दंदी२ घरि घरि वादी, घरि घरि कथण हारं ।।। चौहु जुग मधे जुग चारि थापिला, ग्यांन निरालंब रहिया । मछींद्र प्रसार्दै जती गोरष बोल्या, कोई विरला पार उतरिया ॥२९॥ जो कुछ मन था वह तो अलग हो गया केवल सार मात्र मदिरा के रूप में उतरा । श्रीगोरखनाथ ने ऐसो मदिरा उतारी । मछंदरनाथ के पुत्र-शिष्य कहते हैं कि जिसने यह मदिरा उतारी उसने भर भर कर पी और (जिसने पी ) वह अवधूत अमर हो गया ॥ २० ॥ श्रीगोरख जोगी सत्य सस्य कहते हैं कि हम तो (अपने ) रङ्ग में मस्त रहते हैं। जिसने गुरुमुख शिक्षा के द्वारा अलक्ष्य पुरुष (ब्रह्म) को पहचाना है, उसी के साथ रहना चाहिए। १. (क) एहां या एद्वा; (घ) एइवा । २. (घ) जती गोरषनाथ । ३. (घ) जिणि · तिणि । ५. (क) सत्य सत्य । (घ) हम। ७. (घ) विसहरण ८. (क) रसाइंण । ६. (घ) मूवा ०. (घ) मूवा । ११. रचीले...चूकिले। १२. (घ) नादी; । १३. (क) उतरिया पारं।