पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७

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स्वर्गीय काकू बालमुकुन्दजी गुप्त बाबू बालमुकुन्दजी गुप्तका जन्म हरियाना (पंजाब ) के अन्तर्गत 'गुड़ियानी' नामक कस्बेमें विक्रम संवत् १९२२ (सन १८६५ ई०) कार्तिक शुक्ला ४ को हुआ था। उनके पिताका नाम लाला पूरनमलजी था। वे गोयल गोत्रके अग्रवाल वैश्य थे। भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्रके परवर्ती कालके हिन्दी-साहित्य सेवियोंमें यशस्वी गुप्तजी आगेकी पंक्तिमें दिखाई देते हैं। भारतेन्दुजीका समय सन् १८५० से १८८५ ई० तक समझा जाता है। भारतेन्दुजीके जीवनकालमें गुप्तजी लेखनी धारण कर चुके थे। उस समय उर्दू फारसी साहित्यमें ही उनकी अनुरक्ति थी। उर्दूके सामयिक पत्रोंमें अध्ययनावस्थासे ही उनके लेख प्रकाशित होने आरम्भ हो गये थे। सन् १८८६ ई० में गुमजी उर्दू पत्रकारके रूपमें साहित्य-क्षेत्रमें अवतीर्ण हुए। पहले पहल वे “अखबारे चुनार" के सम्पादक बने थे। इसके पूर्व भारतवर्ष के प्रसिद्ध हिन्दी वक्ता व्याख्यान-वाचस्पति पं० दीन दयालुजी शर्मासे उनका मैत्री-सम्बन्ध स्थापित हो चुका था। पण्डितजीके अनुरोधसे उन्हें "अखबारे चुनार” के बाद लाहौरके “कोहेनूर" का सम्पादन-भार ग्रहण करना पड़ा। सन् १८८८ से १८८६ ई० तक वे कोहेनूर के सम्पादकीय पदपर प्रतिष्ठित रहे। सन् १८८६ ई० में श्रीभारतधर्म महामण्डलके महाधिवेशनके अवसर पर वृन्दावनमें महामना पण्डित मदनमोहन मालवीयसे गुप्तजीकी भंट हुई और मालवीयजीने उस समयके एक मात्र हिन्दी दैनिक "हिन्दोस्थान" के सम्पादकीय मण्डलमें सम्मिलित होनेके लिये उनको आग्रह पूर्वक आमंत्रित किया। “हिन्दोस्थान", कालाकांकरके हिन्दी हितैषी जमींदार