पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६८९

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तकरीर मुंह जुबानी चाहूं तो कलम लेके दिल सबका करूं पानी इस बातमें नहीं है कोई भी मेरा सानी । पढ़ पढ़ मेरी लिखावट लाटोंकी मरे नानी एक काममें हूं कच्चा गो खूब खाक छानी । आती नहीं है मुझको तकरीर मुंहजुबानी ।। गुस्सेसे अगर कोई आंख मुझे दिखावे झट उसके पांव पकडं वह चटसे भूल जावे । है कौन मीठी बात मेरी तरह बनावे लाटोंके घरमें जाकर उनको रिझाके आवे ? आती नहीं है लेकिन तकरीर मुंहजुबानी ।। दरकार हो तो कर दूं लाटोंके कान भारी दरकार हो तो कर दूं हिन्दू जहाज जारी। हिन्दू धरमकी रूसे लण्डनकी हो तयारी जो कहिये कर दिखावं कुदरत ये है हमारी । आती नहीं है लेकिन तकरीर मुंह जुबानी ।। हूं धर्मपालजीका हरवक्त धर्म भाई अलकाटसे भी अपनी है खूब आशनाई । जब जीमें आया तबही “सोऽहं"की रट लगाई सब कुछ है पर है तौभी एक बातकी कचाई। आती नहीं है मुझको तकरीर मुंहजुबानी ।। [ ६७२ ]