पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६२८

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देव-देवी स्तुति रवि ससि तारा अनल प्रात महं ज्योति तुम्हारी। कस्तूरी अरु कुसुमनमैं सौरभ बिस्तारी । मृदुल मलय मारुत डोलत पक्षी बहु कंजत । मधुर कण्ठ अरु बीना मैं तेरो सुर गूंजत । सुन्दरि कामिनि और लता काननकी प्यारी। डोलत है आनन्द भरी लै छटा तिहारी ॥ दसों दिशामें व्यापि रही दस भुजा तुम्हारी । थाम्यो है ब्रह्माण्ड सकलकै पालन हारी । सङ्कट हारिनि वरदायिनि त्रैलोक्य बिहारिनि । दुर्गति नासिनि जगत जननि सब विपद निवारिनि । फैल रही चहुं ओर मातु करुना इक तेरी। दयामयी सब जीवन पर तव दया घनेरी ॥ कृपा दृष्टि करि एक बार जा पै तुम हेरो। कमला विद्या आय करें ताके घर डेरो। हर्षित हिय सब देव मनोरथ पूरै वाके। बिना बुलाये ऋद्धि सिद्धि आवें घर ताके । सुर सेनापति सजिके ताके होहिं सहाई । दुःख सोक अरु ताप मारिके देहिं भगाई ॥ यह भवको आरन्य महिष सम घोर भयङ्कर । सुख सुषमाको संहारक संकटको आकर। भयदायक अति घोर निसाको घोर अंधेरो। [ ६११ ]