पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३७७

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास वाले पत्रको अपने जीमें बहुत तुच्छ समझते हैं और स्वयं पत्र सम्पा- दकको भी कुछ लज्जितसा रहना पड़ता हैं। यह सङ्कीर्णता यहां तक बढ़ गई है कि जिन पत्रोंमें सिरसे पैर तक दूसरे अखबारोंके लेखही नकल होते हैं, वह भी उन अखबारों के नाम देनेसे जी चुराते हैं ; जिनसे कि वह लेख नकल किये हैं। यह दोप उईके पत्रों में हिन्दीके पत्रोंसे भी कहीं बढ़कर हो गया है, विशेषकर पञ्जाबके अग्वबारों में । खैर, उर्दू पत्र इस दोपसे बच या न वचं, हिन्दी पत्रोंको जरूर बचना चाहिये। जो कुछ हो, राजस्थान समाचारके प्रचारसे हमें बड़ी प्रसन्नता है। इसका कारण यही है कि वह रजवाड़ोंका अखबार है। रज- वाड़ोंमें अखवारकी बड़ी जरूरत है और रजवाड़ भारतवर्ष भरमें शिक्षा आदिमें सब प्रान्तोंसे पीछे हैं। राजस्थान ममाचारने निकल कर रजवाड़ोंमें हिन्दोका प्रचार करनेको चेष्टा को है और वहांके लोगोंमें समाचार-पत्र पढ़नेकी मचि बढ़ाई है। यह बहुतही साधु उद्देश्य है। चेट करनेसे वह बहुत कुछ सफलता लाभ कर सकता है। वहांक अभावों और आवश्यकताओं पर ध्यान देता हुआ उक्त पत्र अपने पथको बहुत कुछ ठीक कर सकता है। इसी प्रकार विचार पूर्वक चलनेसे कुछ दिनोंमें उक्त पत्र उन गुणोंका सञ्चय कर सकता है, जो एक हिन्दी दैनिक पत्रके लिये दरकार हैं। हमारी सदा इच्छा है, जिस प्रान्तका वह पत्र है उसमें उसका यश बढ़े। रियासती अग्वबार दो चार हिन्दी अखबार देशो रियासतोंसे भी निकलते हैं। वह ऐसी दशामें हैं कि हिन्दीके पढ़नेवालों से अधिकतर उनके नाम तक भी नहीं जानते। उनमेंसे कई एक बहुत पुराने हैं और किसी न किसो प्रकार चले जाते हैं। जिन-जिन रियासतोंसे वह निकलते हैं उन्हींमें [ ३६० ] पा अपवार