पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३३

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गुप्त-निबन्धावली चरित-चर्चा उन्होंने बहुत तरहके रङ्ग बदले । एक बार बातों ही बातोंमें हमने पाणिनि और पतञ्जलिकी प्रशंसा की। उसपर वह बहुत बिगड़े और हमसे रूठ गये । हमें ठीक याद नहीं कि यह चर्चा किस प्रसंगसे चली थी । स्वरका विषय वह अच्छा जानते थे। हारमोनियम, तबला आदि खूब बजा सकते थे, तथा लोगोंको सिखाते भी थे। बहुत दिनों तक यही उनकी जीविका थी। प्रयागके अमीरोंमें कई एक उनके ऐसे चेले हैं, जिन्होंने उनसे बाजा बजाना सीखा है । उस समय प्रयागमें एक नाटकका दल हुआ था, उसमें तिवारीजीको मोशन मास्टर और बैण्ड मास्टरका पद मिला । वह स्वयं बहुत अच्छा एक्ट करते थे। उन्होंने कई एक नाटक और प्रहमन बनाये। पीछे “प्रयाग समाचार" निकालना आरम्भ किया, जो अबतक चलता है। फिर नाट्यपत्र निकालने लगे। ब्राह्मणोंकी एक सभा बनाई थी, जिसके कई अधिवेशन माघ मेलेमें त्रिवेणी-तटपर हुए ! उनमेंसे दो एक अधिवेशन तो बहुत ही धूमधामके हुए। बहुतसे गरीब ब्राह्मणोंके लड़कोंका यज्ञोपवीत प्रतिवर्ष करा देते थे । उन्होंने एक पाठशाला जारी की थी, जो बहुत दिन तक रही। वह भिक्षाघटके द्वारा चलती थी। बहुतसे घरों में उन्होंने भिक्षाके पात्र रखवा दिये थे। उनसे कई मन अन्न हर महीने आजाता था। पर यह पाठशाला इसलिये न चली कि वह सब ब्राह्मण बालकोंकी एक पंक्ति किया चाहते थे। ऐसा होना हमारे इस प्रान्तमें सर्वथा असम्भव है, और नई बात है। कवितामें उनकी ऐसी उत्तम प्रतिभा थी कि, संस्कृत अच्छी तरह न जानने तथा कोई ग्रन्थ ठीक ठीक न पढ़नेपर भी बीसों श्लोक बैठे-बैठे बना डालते थे। वाल्मीकि रामायणका शब्दार्थ पद्यात्मक अनुवाद उन्हींका बनाया हुआ, सातों काण्ड छपा हुआ, मौजूद है । वह तुलसीदासजीकी कविताकासा चटकीला तो नहीं है, पर वाल्मीकिका भाव उससे बिल्कुल प्रगट हो जाता है। अद्भुत पतिभाके मनुष्य थे। उन्हें कोई सहायक न मिला, नहीं तो बड़े-बड़े [ १६ ]