पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२४५

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(भारतमित्र, १६ फरवरी सन् १९०७ ई.) माली माहबके नाम "निश्चित विषय !" विज्ञवरेषु, साधुवरेषु ! ____ बहुत काल पश्चात् आपसा पुरुष भारतके भाग्यका विधाता हुआ है। एक पंडित, विचारवान और आडम्बररहित सजनको अपना अफसर होते देखकर अपने भाग्यको अचल अटल और कभी टससे मस न होनेवाला, वरञ्च आपके कथनानुमार 'Settlel tuct' समझनेपर भी आडम्बर शून्य भोलेभाले भारतवासी हर्पित हुए थे। वह इसलिये हर्षित नहीं हुए कि आप उनके भाग्यकी कुछ मरम्मत कर सकते हैं। ऐसी आशाको वह कभीके जलांजलि दे चुके हैं। उनका हर्ष केवल इसलिये था कि एक सजनको, एक साधुको, यह पद मिलता है। भलेका पड़ोस भी भला, उसकी हवा भी भली ! “जो गन्धी कछदै नहीं, तोहू बास सुबास !" आप उपाधिशून्य हैं। आपको माई लार्ड कहके सम्बोधन करनेकी जरूरत नहीं है। अथच आप इस देशके माई लार्डके भी माई लाड हैं । यहांके निवामी सदासे ऋषि मुनियों और माधु महात्माओंको पूजते आये हैं और यहाँके देशपति नरपति लोग सदा उन साधु महात्माओंके सामने सिर झकाते और उनसे अनुशासन पाते रहे हैं। उसी विचारसे यहाँक लोग आपके नियोगसे प्रसन्न हुए थे। एक विचारशील पुरुपका सिद्धान्त है कि किसी देशका उत्तम शासन होनेके लिये दो बातोंमेंसे किसी एकका होना अति आवश्यक है-या तो शासक साधु बन जाय या साधु शासक नियत किया जाय । हाकीम हकीम हो जाय या हकीम [ २२८ ]