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अठारहवाँ अध्याय ९०७ जानता है कि सृष्टिका अर्थ ही है क्रिया, कर्म (action) । इसलिये जो कुछ होता है वह तो सृष्टिके इसी नियमके अनुसार ही हो रहा है । इसमे मुझे क्या लेना-देना है ? मै क्यो नाहक इस वलामे फँसने जाऊँ ? जिसने यह सब कुछ बनाया है वह जाने, उसका काम जाने । इस प्रकार आत्माको निर्लेप समझके लोकसग्रहके कर्मोको करते रहना ही उन कर्मोका भगवान या ब्रह्मात्मामे सन्यास है, अर्पण है, डाल देना है। इसलिये अगले श्लोक यही बात बताते है कि भगवान कही बाहर नहीं है । न तो वह बैकुठ या ब्रह्मलोकमे है और न तीर्थो या मन्दिरोमे । वह तो अपनी आत्मा ही है। फलत हृदयमे ही बसता है । हृदयमे बसनेका भी यह अर्थ नही है कि हृदय उसका घर है। उसका पहला आशय तो यही है कि वह आत्मासे अलग नहीं है । दूसरा आशय यह है कि वह तर्क-दलीलो और युक्तियोसे न जाना जाकर हृदय-ग्राह्य ही है । "ज्ञान ज्ञेय ज्ञानगम्य हृदि सर्वस्य धिष्ठितम्” (१३।१७) तथा “सर्वस्य चाह हृदि सन्निविष्ट" (१५।१५) मे भी यही बात कही गई है । केवल तर्क-दलीलोका आश्रय लेना नास्तिकता और निरीश्वरवादमे पहुँचा देता है और केवल हृदय अन्धपरम्पराका भक्त बना देता है । इसलिये यहाँ हृदयग्राह्य कहनेका तात्पर्य यही है कि तर्क-युक्तिकी सहायतासे रास्ता साफ करनेके बाद हृदयसे ही आत्मा-परमात्माका ग्रहण होता है । मनुने भी कहा है कि “यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म वेद नेतर" (मनु० १२१०६)- "जो तर्कसे विचार करता है वही धर्म जानता है, दूसरा नही।" यहाँ उच्छृखल तर्क रोकके हृदयका साथी तर्क ही माना गया है। मनुने जो तर्कको 'वेदशास्त्रका अविरोधी' कहा है उसका यही तात्पर्य है । जिस हृदयने ईश्वरको देख लिया उसमे अलौकिक शक्ति होती है, ऐसी कि दुनियाको हिला दे, डुला दे, चला दे। यह बात हम पहले वहुत विस्तारके साथ लिख चुके है । ६१वे श्लोकका यही आगय है, न कि सचमुच