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सांख्य और योगमें अन्तर सुनो", उसका तो कोई मतलब रही नही जाता। वह बेकार और निरर्थक मालूम पडता है। मगर ऐसा मान भी तो नहीं सकते। गीता- कारको क्या इतनी मोटी भी बुद्धि न थी कि यह बात समझ जाये ? और जो गीतामे साख्य एव योगके दो मार्गोका बारबार जिक्र आया है उसका क्या होगा? यह कोई बच्चोकी तो बात है नहीं। इसीलिये कुछ अजीबसा घपला यहाँ आ खडा होता है । यह बात तो जरूर है । यहाँ दिक्कत तो मालूम होती ही है । इसीलिये जरा गौरसे कई बाते विचारना है। पहली बात यह है कि हम अध्यात्म- वादके उपसहारवाले ३८वे श्लोकके "नवं पापमवाप्स्यसि' तथा कर्म- पोगकी भूमिकाके ३६वे श्लोकके “कर्मबन्ध प्रहास्यसि" शब्दोपर भी विचार करे। पहले शब्द तो इतना ही कहते है कि “ऐसा होनेसे तुम्हारे पास पाप फटकने न पायेगा।" उनका इस बातसे कोई तात्पर्य नही है, कोई भी प्रयोजन नही है कि आया कर्म पाप-पुण्य पैदा करते है या नही, कर्मोंमे पाप-पुण्य पैदा करनेकी शक्ति है या नही । तत्त्वज्ञान और अध्यात्म- बादको इससे कोई भी गर्ज नही होती। वह इन बातोकी ओर दृष्टि डालना फिजूल समझता है। बल्कि यो कहिये कि वह ऐसा करनेको पतन एव पथभ्रष्टताकी निशानी मानता है। वह यह बालकी खाल क्यो वह तो इतना ही कहता है कि जब आत्मा निर्लेप है, अकर्ता है, जब उसमें कर्म हई नही, तो फिर कर्मका फल वह क्यों भोगे ? कर्मका फल उसके निकट आये भी क्यो ? आनेकी हिम्मत भी क्यो करे ? हाँ, एक ही बात है कि मनमे---दिल-दिमागमे- उसकी कल्पना कर ली जाय तो गड़बड हो सकती है, होती है। इसीलिये उसने उसी चीजको अन्तमे रोक दिया है और साफ कह दिया है कि खबरदार, दिल-दिमागकी गभीरता (serenity) विगडने न पाये । फिर मजाल किसकी कि फँसा सके ? ऐसी दशामे खीचने लगा ? &