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५४ गीता-हृदय - ही त्यागनेका, दूसरा है केवल सभी कर्मोके फलोके ही त्यागका, न कि किसी भी कर्मके त्यागका, तीसरा है सभी कर्मोंके ही त्यागका और चौथा है यज्ञ, दान तथा तपके सिवाय शेष कर्मोके त्यागका। इस प्रकार त्यागके बारेमें चार तरहके सिद्धान्त साफ हो जाते है । आगेके ४से इतकके श्लोको में कृष्णने जो खुद अपना मत बताया है उसमे यह कहा है कि यज्ञ, दान तथा तपको भी, कर्मासक्ति एव फलासक्ति छोडकर ही, करना यही त्याग कहा जाता है, कहा जाना चाहिये। उनने इन तीनो कर्मोंकी वडी वडाई की है और कहा है कि "ये तो पवित्र करने- वाले है ऐसा मनीषी लोग भी मानते है"--"यज्ञो दान तपश्चैव पावनानि भनीषिणाम् ।" फलत इनके छोडनेका सवाल तो उठी नही सकता। हाँ, यह किया जाना चाहिये जरूर कि इनमें तथा इनके फलोमे आसक्ति रहने न पाये । जहाँ चौथा पक्ष इन तीनोके करने में कोई विशेष बात नही कहता, तहाँ कृष्णका मत है कि इन तीनोको भी कर्मासक्ति तथा फलासक्ति छोडकर ही करना होगा। फिर सातसे लेकर बारह तकके श्लोकोमे त्यागकी सात्त्विक आदि किस्मे बताके उसका विवरण दिया गया है। उसके बाद कर्मके पाँच कारणोका निरूपण करके १३से १७ तक यह सिद्ध किया गया है कि आत्मा तो इन पाँचोमे है नही। वह तो अलग और निर्लेप है। इसलिये कर्मका साथी उसे मानके सभी कर्मोंसे बचनेकी कोशिश बेकार है, नादानी है। बादमें १८से २८ तक यह बात विचारी गई है कि आखिर कर्म होता है कैसे और वह रहता है कहाँ, और इस तरह प्रतिपादन किया गया है कि आत्मासे उसका ताल्लुक हई नही। वह तो दूसरी ही चीजें है जिनसे कर्म सम्वद्ध है। कर्मके करनेमें अन्त करण या बुद्धि और घृति (हिम्मत, धारणशक्ति) की जरूरत होती है। ये दोनो न रहें तो कर्म हवामें मिल जाय । बुद्धि रास्ता बताती है और धृति पस्ती आने न देकर कर्म-मार्गमे