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सृष्टिका क्रम २७६ गुणकी बात करते है तो यह मतलब नही होता है कि खाली वही गुण रहते है । यह तो असभव है। गुण तो तीनो ही हमेशा मिले रहते है। इसीलिये इन्हें एक दूपरे से चिपके हुए--"अन्योन्यमिथुनवृत्तय -" साख्य कारिका (१२) में लिखा है। इसलिये सत्त्व कहनेका यही अर्थ है कि उसकी प्रधानता रहती है। इसी प्रकार रजका भी अर्थ है रजोगुण-प्रधान अश। दोनोमें हरेकके साथ वाकी गुण भी रहते है सही, मगर अप्रधान रूपमे। अब वचे पाँचो तन्मात्राअोके तम प्रधान अश जिन्हे तमोऽश या तमोगुण भी कहते है । उन्हीसे ये स्थूल पाँच महाभूत-पाकाश प्रादि- बने । जो पहले सूक्ष्म थे, दीखते न थे, जिनका ग्रहण या ज्ञान होना असभव था, वही अब स्थूल हो गये। जैसे अदृश्य हवामो-प्रोक्सिजन तथा हाईड्रोजन-को विभिन्न मात्राओ मे मिला के दृश्यजल तैयार करते है, ठीक वैसे ही इन सूक्ष्म पाँचो तन्मात्राओके तमप्रधान अशोको परस्पर विभिन्न मात्रामे मिलाके स्थूल भूतोको बनाया गया। इसी मिलानेको पचीकरण कहते है। पचीकरण शब्दका अर्थ है कि जो पाँचो भूत अकेले- अकेले थे--एक-एक थे---उन्हीमे चार दूसरोके भी थोडे-थोड़े अशा मिले और वे पाँच हो गये, या यो कहिये कि वे पाँच-पाँचकी खिचड़ी या समिश्रण बन गये। दूसरे चारके थोडे-थोडे अग मिलानेपर भी अपना- अपना अग तो ज्यादा रहा ही। हरेकमे आधा अपना रहा और आधेमें शेष चारके वरावर अश। इसीलिये अपने आधे भागके करते ही हरेक भूत अलग-अलग रहे । नहीं तो पाँचोमे कोई भी एक दूसरेसे अलग हो नही पाता। फलत. यह हालत हो गई कि पृथिवीमे आधा अपना भाग रहा और आधेमे शेष जल आदि चार रहे। यानी समूची पृथिवीका प्राधा वह खुद रही और बाकी आधेमे शेप चारो वरावर-वरावर रहे। इस तरह समूचीमें इन प्रत्येकका आठवाँ भाग रहा। इसीलिये उसे