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गीताका समन्वय तो मौका रही नही जाता। साथ ही, बहुमतके निर्णयको परीशांनीसे भी पिंड छूट जाता है। गीताकी जो अध्यात्म दृष्टि है उसमे कुछ ऐसी शक्ति और जडी-बूटीकी ताकत है कि हर कामकी बाहरी रूपरेखाको वदलके वह उसे सुन्दर, निर्दोष और कल्याणमय बना देती है। इसका यह मतलब हर्गिज नही है कि इसके चलते कर्तव्य-अकर्तव्यके ससारमे अन्धेर मच जायगी, यह सभीके बाहरी रूपको पलटनेवाली मानी जो जाती है । बात ऐसी नही है । इस दृष्टिके फलस्वरूप आमतौरसे अच्छे माने जानेवाले कामोमे प्रवृत्ति और दूसरोसे निवृत्ति तो एक तरहका नियम बन जाती है, स्वभाव बन जाती है। मगर अपवाद स्वरूप अगर कभी सयोगवश उलट-फेर भी हुई, तो भी गडबड होने नही पाती और इसके करते वैसे ही मौकेपर ऊपरसे बुरे दीखनेवाले कामो और अमलोकी कायापलट हो जाती है । फलत कही भी पश्चात्ताप या अफ- सोसकी गुजाइश रह नही जाती। यदि कहे तो कह सकते है कि सासारिक दृष्टि और परखमे जो कमी और मानव स्वभावमे जो त्रुटि रह जाती है उसीकी पूर्ति कर्त्तव्याकर्त्तव्यके बारेमे यह अध्यात्म दृष्टि करती है । यह बात प्रसगवश आगे दिखाई जायगी। लेकिन एक बात यहीपर जान लेना जरूरी है। गीताके सिद्धान्तके अनुसार किसी भी क्रियाका, कामका, अमलका, ऐक्शन (action)का वाहरी रूप कोई चीज नहीं है। किसी भी कामको बाहरसे, ऊपरसे या योही देख सुनके हम उसे भला या बुरा नहीं कह सकते। ठोस या स्थूल पदार्थोंकी बात है कि उनका जो रूप देखा सुना जाता है आमतौरसे वही सही और असली माना जाता है और उसीके मुताबिक उन्हे हेय या उपादेय, त्याज्य या ग्राह्य माना जाता है। मगर यह बात कर्मों या अमलोके बारेमें लागू नही है । ऊपरसे जिन कामोको हम सुन्दर, कर्तव्य और ग्राह्य मानते है वह क उलटे हो सकते है। यही हालत बुरे, अकर्त्तव्य तथा