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२. मार्क्सवाद और धर्म १०६ बहुत वडा महत्त्व रखती है । इसलिये उनपर विशेष खयाल होना जरूरी है। लेनिनने यह साफ कह दिया है कि हम खयाली और सैद्धान्तिक रूपसे ही नास्तिकता या अनीश्वरवादके समर्थक नहीं है। बल्कि हम तो इस निरी दिमागी दुनियाके विरोधी है। इसमे तो उसे अवसरवाद और अराजकवाद साफ ही मालूम होता है । इसलिये भी उसने इसका विरोध किया है। इसीके साथ वह यह भी साफ कहता है कि हमारा (मार्क्सवादका) अनीश्वरवाद तो ऐसा नहीं है जो हर समय, हर परिस्थितिमे लागू किया जा सके। यह कोई कोरी सिद्धान्तकी चीज नही है । यह तो सिर्फ व्यावहारिक वात है। इसीलिये इसका प्रयोग व्यावहारिक परिस्थितिको देखने के बाद ही खूब जानबूझके करना होगा। कही ऐसा न हो कि हमने परिस्थिति तो इसके अनुकूल देखी और इसे लागू भी किया। मगर ऐसा हो गया कि हमने आगेका मौका समझा नही कि अब इसे बन्द कर देना होगा, क्योकि इसकी सीमा पूरी हो रही है। नतीजा यह हुआ कि अवसरवादमे हम जा फँसे । इसीलिये हमेशा सतर्क रहनेपर उसने जोर दिया है। वह यह भी कहता है कि हमे तो वर्गसंघर्ष देखना है-हमारे लिये तो नास्तिकवाद असल चीज है नही। वह यदि कुछ भी हो सकता है तो ज्यादेसे ज्यादा यही कि वर्गसंघर्षको निर्विघ्न चालू करनेमे मददगार हो जाय। मगर हमारा साध्य या असली लक्ष्य तो है वह वर्गसंघर्ष ही। इसलिये हमे बराबर यह खयाल रखना होगा कि कही हमारे नास्तिकवादसे उलटे उसीमें हानि न पहुँच जाये। कही ऐसा न हो कि साधन ही साध्यकी छातीपर कोदो दलने लग जाय--कही देवीसे बकरा ही बडा न हो जाय और ऐसा न हो कि देवीकी छातीपर वही चढ बैठे। यह सबसे मार्केकी वात उसने कही है।