पृष्ठ:गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र.djvu/८५०

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गीता, अनुवाद और टिप्पणी १६ अध्याय। 8 द्वौ भूतसौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च । देवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न चिदुरासुराः। न शौचं नापि चाचारोन सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७॥ असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । [संक्षेप में यह पतला दिया कि इन दो प्रकार के पुरुषों को कौन सी गति मिलती है। भय पिस्तार से प्रापुरी पुरुषों का वर्णन करते हैं-] (E) इस लोक में दो प्रकार के प्राणी उत्पन जुमा करते हैं (एक) देव पार पूसरे आसुर । (इनमें) देय (श्रेणी का) वर्णन विस्तार से कर दिया; (अय) हे पार्थ! में बासुर (श्रेणी का) वर्णन करता हूँ, सुन । 1 [पिछले अध्यायों में यह बतलाया गया है कि कर्मयोगी कैसा बर्ताव करे भीर मामी अपस्था कैसी होती है या स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त अथवा त्रिगुणातीत किसे कहना चाहिये और यह भी बताया गया है कि ज्ञान क्या है । इस अध्याय के पहले तीन श्लोकों में देवी सम्पत्ति का जो लक्षण है, वही देव प्रकृति के पुरुष का वर्णन है इसी से कहा है कि देव श्रेणी का वर्णन विस्तार से पहले कर चुके हैं। आसुर सम्पत्ति का थोड़ा सा प्रलेख नवें अध्याय (E.0 और १२) में मा चुका है। परन्तु यहाँ का वर्णन अधूरा रह गया है, इस कारण इस अध्याय में उसी को पूरा करते हैं- (७) प्रासुर लोग नहीं जानते कि प्रवृत्ति क्या है, और निवृत्ति क्या है-भवांव वे यह नहीं जानते कि क्या करना चाहिये और क्या न करना चाहिये । उनमें न शुद्धता रहती है, न आचार और सत्य ही। () ये (पासुर नोग) कहते हैं कि सारा जगत अ-सत्य है, अ-प्रतिष्ठ अर्थात निराधार है, अनीवर यानी बिना पर- मेयर का है, अ-परस्परसम्भूत अर्थात् एक दूसरे के बिना ही हुआ है, (अतएव) काम को छोड़ अर्थात् मनुष्य की विषय-वासना के अतिरिक्त इसका और क्या देत हो सकता है। । [यद्यपि इस लोक का अर्थ स्पष्ट है, तथापि इसके पदों का अर्ष करने में बहुत कुछ मतभेद है। हम समझते हैं कि यह वर्णन उन चार्वाक आदि नास्तिकों के मतों का है कि जो वेदान्तशास्त्र या कापिल सांख्यशास्त्र के सृष्टि- रचनाविषयक सिद्धान्त को नहीं मानते; भौर यही कारण है कि इस श्लोक के पदों का अर्थ सांख्य और अध्यात्मशास्त्रीय सिद्धान्तों के विरुद्ध है । जगत को नाशवान समझ कर वेदान्ती उसके अविनाशी सय को-सत्यस्य सत्यं (वृ.२. ३.६) खोजता है, और उसी सय तस्य को जगत का मूल प्राधार या प्रतिष्ठा मानता है-ब्रह्मपुच्छ प्रतिष्ठा (ले. २.५)। परन्तु आसुरी लोग कहते हैं कि यह जग अ-सस है, अर्थात् इसमें स य नहीं है। और उसी लिये वे इस जगत् को