पृष्ठ:गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र.djvu/८

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प्रस्तावना।
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सन्तों की उच्छिष्ट उक्ति है मेरी वानी।
जानें उसका भेद भला क्या, मैं अज्ञानी !

श्रीमद्भगवद्गीता पर अनेक संस्कृत भाष्य, टीकाएँ तथा देशी भाषाओं में 'सर्वमान्य निरूपण हैं । ऐसी अवस्था में यह अन्य क्यों प्रकाशित किया गया ? यद्यपि इसका कारण अन्य के आरम्भ में ही वतला दिया गया है, तथापि कुछ बातें ऐसी रह गई हैं कि जिनका, अन्य के प्रतिपाद्य विषय के विवेचन में, उलेख न हो सकता था। उन बातों को प्रगट करने के लिये प्रस्तावना को छोड़ और दूसरा स्थान नहीं है। इनमें सब से पहली यात स्वयं प्रन्यकार के विषय में है। कोई तेतालीस वर्ष हुए, जब हमारा भगवद्गीता से प्रथम परिचरा हुआ था १८७२ ईसवी में हमारे पूज्य पिताजी अन्तिम रोग से आक्रान्त हो पाया पर पड़े हुए थे । उस समय उन्हें भगवाहीता की मापानिति नामक मराठी टीका सुनाने का काम हमें मिला था । तव, अर्थात् अपनी आयु के सोलहवें वर्ष में, गीता का भावार्थ पूर्णतया समझ में न आ सकता था। फिर भी छोटी अवस्था में मन पर जो संस्कार होते हैं, वे दृढ़ होजाते हैं। इस कारण उस समय भगवद्गीता के सम्बन्ध में जो चाह उत्पन्न हो गई थी, यह स्थिर बनी रही । जब संस्कृत और अंग्रेज़ी का अभ्यास अधिक हो गया, तब हमने गीता के संस्कृत भाष्य, अन्यान्य टीकाएँ और मराठी तथा अंग्रेज़ी में लिखे हुए अनेक पण्डितों के विवेचन समय-समय पर पढ़े। परन्तु अप, मन में एक शंका उत्पन्न हुई, और वह दिनों दिन यढ़ती ही गई। वह शंका यह है कि, जो गीता उस अर्जुन को, युद्ध में प्रवृत्त करने के लिये पतलाई गई है कि जो अपने स्वजनों के साथ युद्ध करने को बड़ा भारी कुकर्म समझ कर खिन्न हो गया था, उस गीता में ब्रह्माज्ञान से या भफि से मोक्षप्राप्ति की विधि का- निरे मोक्षमार्ग का-विवेचन क्यों किया गया है ? यह शंका इसलिये और भी दृढ़ होती गई, कि गीता की किसी भी टीका में इस विषय का योग्य उत्तर हूँढ़े न मिला । कौन जानता है कि हमारे ही. समान और लोगों को भी यही शंका हुई न होगी। परन्तु टीकाभों पर ही निर्भर रहने से, टीकाकारों का दिया हुआ उत्तर समाधानकारक न भी जैवे; तो भी उसको छोड़ और धूसरा उत्तर 'सूलता ही नहीं

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☆ साधु तुकाराम के एक 'ममंग' का भाव ।

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