पृष्ठ:गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र.djvu/६३

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२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र । अर्थात् " हे अभ्युत ! स्वकर्तव्य संबंधी मेरा मोह और संदेह नष्ट हो गया है, अब मैं आप के कयनानुसार सब काम करूंगा"। यह अर्जुन का केवल मौखिक उत्तर नहीं था, उसने सचमुच उस युद्ध में भीष्म-का-जयद्रय प्रादि का वध भी किया। इस पर कुछ लोग कहते हैं कि “मगवान् ने अर्जुन को जो उपदेश दिया है वह केवल निवृत्रिविषयक ज्ञान, योग या भक्ति का ही है और यही गीता का मुख्य प्रतिपाद्य विषय भी है। परन्तु युद्ध का आरंम हो जाने के कारण यीच बीच में, कर्म की थोड़ी सी प्रशंसा करके, भगवान् ने अर्जुन को युद्ध पूरा करने दिया है। अर्थात् युद्ध का समाह करना मुख्य बात नहीं है - दसको सिर्फ भानुषंगिक या अयंवादात्मक ही मानना चाहिये। परन्तु ऐसे अघर और कमज़ोर युनिवाद से गीता के उपक्रमोपसंहार और परिणाम की उपपत्ति ठीक ठीक नहीं हो सकती। यहाँ (कुरुक्षेत्र) पर तो इसी बात के महत्व को दिखाने की आवश्यकता थी कि स्वधर्म संबंधी अपने कर्त्तव्य को मरणपर्यन्त, अनेक कट चार बाधाएँ सह कर भी करते रहना चाहिये । इस बात को सिद्ध करने के लिये श्रीकृष्ण ने गीता भर में कहीं भी वै-सिर पैर का कारण नहीं बतलाया है, जैसा ऊपर लिखे हुए कुछ लोगों के प्राक्षेप में कहा गया है। यदि ऐसा युनिधीन कारण यवलाया भी गया होता तो अर्जुन सरीला बुद्धिमान और छानवीन करनेवाला पुरुप इन बातों पर विश्वास कैसे कर लेता? उसके मन में मुख्य प्रन्न क्या था? यही न, कि मयंकर कुलजय को प्रत्यक्ष श्रीखों के आगे देख कर मी मुझे युद्ध करना चाहिये या नहीं; भार युद्ध करना ही चाहिये तो कैसे, जिससे पाप न लगे? इस विक्ट प्रश्न के (इस प्रधान विषय के) उत्तर कोकि "निष्काम बुद्धि से युद्ध कर " या "कमंजर अर्थवाद कह कर कभी भी नहीं टाल सकते। ऐसा करना मानी घर के मालिक को उसी के घर में मेहमान यना देना है ! हमारा यह कहना नहीं है कि गीता में वेदान्त, भक्ति और पातंजल योग का उपदेश विलकुल दिया ही नहीं गया है। परन्तु इन तीनों विषयों का गीता में जो मेल किया गया है वह केवल ऐसा ही होना चाहिये कि जिससे, परस्पर-विन्द धर्मों के भयंकर संकट में पड़े हुए " यह कहें कि यह " कहनेवाले कम्य-मूढ़ अर्जुन को अपने कर्तव्य के विषय में कोई निप्पाप मागं मिल जाय शार वह चान- धर्म के अनुसार अपने शास्त्रविहित कर्म में प्रवृत्त हो जाय । इससे यही बात सिद्ध होती है कि प्रवृत्तिधर्म ही का ज्ञान गीता का प्रधान विषय है और अन्य सच यातें उस प्रधान विषय हो कि सिद्धि के लिये कही गई है यान वे सब जानुपंगिक हैं, अतएव गीताधर्म का रहस्य भी प्रवृत्तिविषयक प्रर्यात कर्मविपर ही होना चाहिये। पान्तु इस बात का सटीकरण किसी भी टीकाकार ने नहीं किया है कि यह प्रवृत्ति- विषयक रहस्य क्या है और वेदान्तशाच होस कसे सिद्ध हो सकता है । जिस टीकाकार को देखो वही, गीता के प्रायन्त के उपक्रम-उपसंहार पर ध्यान न दे कर, निवृत्तिदृष्टि से इस बात का विचार करने ही में निमन्स देख पड़ता है, कि गीता का ग्रहमान या भक्ति अपने ही संप्रदाय के अनुयूल कैस है। मानो ज्ञान और भक्ति