पृष्ठ:गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र.djvu/५००

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गीताध्याय-संगति। बसला देना मी मगयान नहीं भूले हैं। अय विश्वरूप के, और विभूतियों के, वर्णन में ही तीन चार अध्याय लग गये इसालो यदि इन तीन चार अध्यायों को (पध्यायी को नहों) स्थूलमान से भाकिमार्ग' नाम दना दी किपीको पसन हो तो ऐसा करंन में कोई हर्ज नहाँ। पान्तु, कुछ भी काईये; यह तो निश्चित रूप से मानना पड़ेगा कि गीता में भक्ति और ज्ञान को न मा पृथक किया इरन इन दंनों मागों को स्वतंस कहा है। संक्षेप में उक्त निरूपाण का यही भावापं ध्यान में रहे. कि फर्मयोग में जिस साम्याधुद्धि को प्रधानता दी जाती है उसकी प्राप्ति के लिये परमेश्वर के सर्वव्यापी स्वरूप का ज्ञान होना चाहिय; फिर, यह ज्ञान पा व्यक्त की उपासना से हो और घाई प्रत्यक्त की-युगमता के अतिरिक्त इनमें अन्य कोई भेद नहीं पार गीता में सातवे से लगा फर सग्रह अध्याय तक सय विपयों को ज्ञान-विज्ञान' या अध्यात्म ' यही एक नाम दिया गया है। जप मगवान् ने अर्जुन के चर्मचक्षुओं' को विशरूर-दर्शन के द्वारा या प्रत्यक्ष अनुभव फरा दिया, कि परमवर ही सारे Raiट में या क्षततर-सष्टि में समारा हुमा तय रहय अध्याय में ऐसा क्षेत्र क्षत्रशनचार पतलाया है, कि यही परमेश्वर पिंड में अचान मनुष्य के शरीर में या क्षेत्र में प्रात्मा के रूप से निवास करना है और इस मात्मा का प्रति क्षत्रज्ञ का जो ज्ञान हेवही पामधर का (परमात्माका) भी ज्ञान है। प्रथम परमात्मा का अर्थात् परममा का अनादि: मत्परं नाम " इत्यादि प्रकार से, उपनिषदों के आधार मे, घगीन करके आगे अत. लाया गया है, कि यही क्षेत्र-तत्रज्ञ-विचार प्रकृति और 'पुरुष' नामक सांख्य- विवचन में अंतर्भूत हो गया है। एगर अन्त में यहवान किया गया है कि जो 'प्रकृति ' और 'पुरुष' के भेद को पहचान कर अपने ज्ञान-चतुओ' के द्वारा सर्वगत निर्गुगा परमात्मा को जान लेता है, यह मुक्त हो जाता है । परन्तु उसमें भी कर्मयोग का यह सून स्थिर रखा गया है, कि सब काम प्रति फाती है, खात्मा पत्ता नहीं है. यह जानने से कम यंधक नहीं होते' (१३. २९); और भाक्तिका " ध्यांगना-मनि पश्यन्ति " ( १३. २४) यह सूत्र भी कायम है। चौदहवें अध्याय में इसी ज्ञान का वर्णन करते हुए सांख्ययान के अनुसार यतलाया गया है, कि सर्वन एक ही आत्मा या परमेधा के होने पर भी प्रकृति के सत्व, रज और तम गुणों के भेदों के कारगा संसार में चौचय उत्पन होता है। आगे कहा गया है, कि जो मनुष्य प्रकृति के इस खेल को जानकर और अपने को फी न समझ भारी योग से परमेश्वर की सेवा करता है, वही सया निगुगातीन या युक्त है । अन्त में अर्जुन के प्रश्न करने पर स्थित-ज्ञ और भानिमान् पुरुष की स्थिति के समान ही सिगु- णातीत की स्थिति का वर्णन किया गया है। श्रुति-प्रन्यों में परमेश्वर का कहीं कहीं वृक्षरूप से जो चीन पाया जाता है, उसीका पन्द्रह अन्याय के प्रारम्भ में घर्णन करके भगवान् ने यतलाया है, कि जिसे सांख्य-बादी प्रकृति का पसारा' कहते हैं वही