पृष्ठ:गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र.djvu/३६९

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३३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशाम । में लोकसंग्रह पद से इतना अर्थ विवक्षित है कि-अकेले मनुष्यलोक का ही नहीं, किन्तु देवलोक आदि सब लोकों का भी उचित धारण-पोपण होवे और वे परस्पर एक दूसरे का श्रेय सम्पादन करें। सारी सृष्टि का पालन-पोषण करके लोकसंग्रह करने का जो यह अधिकार भगवान् का है, वही ज्ञानी पुरुष को अपने ज्ञान के कारण प्राप्त हुमा करता है। ज्ञानी पुरुष को नो वात प्रामाणिक जंचती है, अन्य लोक भी इसे प्रमाण मान कर तदनुकूल व्यवहार किया करते हैं (गी.३. २१)।क्योंकि, साधारण लोगों की समझ है, कि शान्त चित्त और समवृद्धि से यह विचारने का काम ज्ञानी ही का है, कि संसार काधारण और पोपण कैसे होगा एवं तदनुसार धर्म-प्रबन्धकी मर्यादा बना देना भी उसी का काम है। इस समझ में कुछ भूल भी नहीं है । और, यह भी कह सकते हैं कि सामान्य लोगों की समझ में ये यात भली भांति नहीं श्रा सकती, इसी लिये तो वे ज्ञानी पुरुपों के भरोसे रहते हैं। इसी भाभप्राय को मन में ला कर शान्तिपर्य में युधिष्ठिर से भीष्म ने कहा है- लोकसंग्रहसंयुक्तं विधामा विहितं पुरा । सूक्ष्मधर्मार्थनियतं सतां चरितमुत्तमम् ॥ अर्थात् " लोकसंग्रहकारक और सूक्ष्म प्रसङ्गों पर धर्मार्थ का निर्णय कर देनेवाला साधु पुरुषों का, उत्तम चरित स्वयं प्रसदेव ने ही बनाया है" (ममा. शा २५८. २५) ।' लोकसंग्रह ' कुछ ठाले बैठे की येगार, ढकोसला या लोगों को प्रज्ञान में डाले रखने की वरकीच नहीं है किन्तु ज्ञानयुक्त कर्म के संसार में न रहने से जगत के नष्ट हो जाने की सम्भावना है इसलिये यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मदेव- निर्मित साधु पुरुषों के कर्तव्यों में से लोकसंग्रह' एक प्रधान कम्य है । और, इस भगयद्ववचन का भावार्य भी यही है, कि "मैं यह काम न करूं तो ये समत लोक अर्थात् जगत् नष्ट हो जायेंगे" (गी. ३. २४) ज्ञानी पुरुष सब लोगों के नेत्र हैं। यदि वे अपना काम छोड़ देंगे, तो सारी दुनिया अन्धी हो जायगी और इस संसार का सर्वतोपरि नाश हुए बिना न रहेगा। ज्ञानी पुरुषों को ही उचित है, कि लोगों को ज्ञानवान् कर टन्नत बनावें । परन्तु यह काम सिर्फ जीम हिला देने से अर्थात् कोरे उपदेश से ही कभी सिद्ध नहीं होता । क्योंकि, जिन्हें सदाचरण की आदत नहीं और लिनकी युति मी पूर्ण शुद्ध नहीं रहती, उन्हें यदि कोरा ममज्ञान सुनाया जाय तो वे लोग उस ज्ञान का दुरुपयोग इस प्रकार करते देखे गये हैं- "तेरा सो मेरा, और मेरा तो मेरा है ही।" इसके सिवा, किसी के उपदेश की सत्यता की जाँच भी तो नोग उसके आचरण से ही किया करते हैं। इसलिये, यदि ज्ञानी पुरुप स्वयं कर्म न करेगा, तो वह सामान्य लोगों को आलसी बनाने का एक वहत बड़ा कारण हो जायगा । इसे ही 'बुद्धिभेद' कहते हैं और यह बुद्धि-भेदन होने पाने तथासवनोग, सचमुच निष्काम होकरभपना कर्तव्य करने के लिये जागृत हो जावें इसलिये, संसार में ही रहकर अपने कर्मों से सब लोगों को सदाचरण की-